Tuesday, 18 August 2015

मुफलिसी को आने दो

शिकायतें तो बहुत हैं मगर जाने दो
जो गुज़र गया उसे गुज़र जाने दो
वो होंगे तो कुछ काम होगा मेरा
साहब को इसी वहम में मर जाने दो
नादान परिदों को पर फड़फड़ाने दो
जब गिरें आसमां से तो गिर जाने दो
खंजर छिपा के बज़्म में दोस्त लाएंगे
ये ठहरे दुश्मन इन्हें अंदर आने दो

ज़बरदस्ती से नहीं बनते दिल के रिश्ते
वो दामन छुड़ा के जाते हैं तो जाने दो
जिंदगी क्या है ये जल्द समझ जाओगे
घर में बस  मुफलिसी को आने दो
सुबह होने दो अक्ल ठिकाने पर होगी
अभी तो पी रखी है उतर जाने दो

मेहरीन जाफरी

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