Wednesday, 5 August 2015

मैं ग़मगीन हंू इसलिए नहीं...................!

क्यंू करते हो ऐसा? खुदा ने इतनी खूबसूरत दुनियां बनाई। इस दुनियां में सबसे हसीन और अक्लमंद इंसान की ज़ात ही तो है जो सही और ग़लत के बीच के फर्क को समझने-बूझने की ताक़त रखती है। फिर क्यंू जिंदगी जीने के लिए गलत रास्ता ही चुनते हो। बेलगाम ख्वाहिशों को पूरा करने के लिए ही न! और तुम ही नहीं रहे तो फिर! क्या होगा इन ख्वाहिशों की ताबीर का? शायद तुम्हारे जुनून से ख्वाब और ख्वाहिशें पूरी हो भी गई हों लेकिन यह तो सोचो कि तुम तो रहे नहीं साथ ही एक दाग़ छोड़ गए अपने पूरे खानदान के माथे पर, एक आतंकी होने का। इस दुनियां में तो हिसाब हो गया तुम्हारे आमाल का अब खुदा की बारगाह में भी तुम पर केस चलेगा। वहां भी तो अभी लगेगा तुम पर इल्जा़म हज़ारों बेगुनाह लोगों की जिंदगी बेवक्त छीन लेने का। बच्चों को अनाथ बनाने का। औरतों को बेवा और मांओं की गोद उजाड़ने का। देखो तुम कितने लोगों के गुनहगार हो! फिर भी न जाने क्यों अफसोस है इस बात का कि तुम भी एक बेवक्त की मौत मारे गए और पीछे छोड़ गए अपने रोता-बिलखता उन लोगों को जिनका शायद तुम्हारे गुनाह से कोई लेेेेेेेेना-देना ही नहीं।
लेकिन पीछे तो उनके भी बहुत से लोग थे रोने के लिए, जिनके जिस्म चिथड़े हुए थे। बहुत बड़ा फर्क है तुममे और उन बेगुनाह लोगों में जो तुम्हारे कारण मुम्बई बम धमाकों में मारे गए। फिर भी मैं कुछ ग़मगीन सी हंू तुम्हारी मौत पर इसलिए नहीं कि तुमसे हमदर्दी है बल्कि इसलिए कि मैं अल्लाह की दी हुई जिंदगी को बहुत.....बहुत.....बहुत बेशक़ीमती मानती हंू। उसी का दिया हुआ दिल है मेरे सीने के अंदर........जो हस्सास है। रो पड़ता है किसी की भी तकलीफ पर.........फिर वह तुम जैसा गुनहगार ही क्यों न हो। फिर भी मैं रोती हंू इसका मतलब यह मत लगाना कि कमजो़र हंू............मैं अपने आंसू पोछते हुए यह कहना चाहती हंू कि हां मैं अपने देश के कानून पर भरोसा रखती हंू और एक नहीं हज़ार बार उन लोगों को फांसी दिए जाने के हक़ में हंू जो इंसान कहलाते तो हैं लेकिन खुद अपने हाथों इंसानियत का गला घोंटने से बाज़ नहीं आते। जिस्म तो इंसान का लेकिन सोंच और आमाल से हैवान। ऐसे लोगों के लिए कड़े फैसले ज़रूरी होते ही हैं। कहते हैं न कि कुछ गुनाह तो खुदा भी माफ नहीं कर सकता। सच है। याक़ूब मेमन और उस जैसों के लिए कोई माफी व रियायत होनी भी नहीं चाहिए। अभी नहीं, कभी नहीं।

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