Thursday, 14 August 2014

अंग्रेजी शासन से मुक्ति पर आज़ाद कब कहलाएंगे...!



आज़ादी के 68 साल बाद भी आप हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे को याद करके क्यों दुखी होते हैं? या डिवाईड एण्ड रूलयानी बांटों और राज करो की नीति के लिए अंग्रेजों की निंदा क्यों करते हैं। जबकि आप खुद आज धर्म, जात, क्षेत्र, भाषा, राज्य, आर्थिक और यहां तक कि बौद्धिक आधार पर बंटवारे के लिए तैयार रहते हैं। फिर इसी बंटी हुई जमात में से अपना नेता चुनते हैं। ज्यादा दूर न जाईए तो दो महीने पहले सम्पन्न हुए आम चुनाव तक चलते हैं। धर्म के नाम पर बीजेपी को जिताने के लिए एक तरफ हिंदू एकजुट होते दिखाई दिए तो कई इलाकों में मुसलमान संगठित हुए बीजेपी को शिकस्त देने के लिए। इन्होंने उनके लाल टीके से खुन्नस निकाली तो उन्होंने इनकी सफेद टोपी व दाढ़ी से़। इधर आपके समर्थन में एलीट वर्ग खड़ा नज़र नहीं आया। इन्हें यह डर कि जुड़ गया तो इनकी खासियत जाती रहेगी। इसी तरह बसपा दलितों और पिछड़ों की पार्टी मानी जाती है, तो यहां तो और भी दिक्कत है। एकआध बार नाम लिया,तज़किरा किया बसपा सुप्रीमो मायावतीका अपनी पढ़ी-लिखी सर्वण हम मज़हब बहनों के बीच। जवाब में सुनने को मिला कि वह तो मेहतरों-चमारों की नेता हैं, इनसे तो बेहतर है सपा को चुनें, आखिर मुसलमानों के हक की बात तो करती है। दिल को ठेस लगी यह सोंचकर कि सड़क किनारे चाट के ठेले पर गोलगप्पे खाने से पहले तो तुम चाट वाले की जात नहीं पूछतीं फिर मताधिकार के प्रयोग के लिए कास्ट कांशिएसक्यों?
ज़रा यूपी के हालिया हालात पर नज़र डालिए। एक लड़का किसी लड़की को छेड़ता है तो इसे धर्म व जात की इज्जत का सवाल बना लिया जाता है और प्रदेश में दंगे भड़क जाते हैं। यहां मुसलमान मंदिर में लगा लाउडस्पीकर उतारने को आतुर हैंै क्योंकि उसे डर है कि भजन सुनने से उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। क्या इसी दिन के लिए हमने अंग्रेजों से आज़ादी हासिल की थी? शहीदों ने अपना खून बहाया था कि भाई-भाई का गला काटे। यूपी-बिहार के लोग महाराष्ट जाते हैं रोज़ी-रोटी की तलाश में। अपनी प्रतिभा के बलबूते नौकरी हासिल करना चाहते हैं पर एक नहीं कई बार ये हुआ कि क्षेत्रवाद से प्रेरित होकर टैलेण्ट को भईयाकहकर धक्का दे दिया गया। अंग्रेजी जानने वाला आदमी हिंदी जानने वाले के रास्ते का कांटा बना बैठा है। कैसी विडंबना है? अवसर के लिए भाषा के खिलाफ जंग छेड़नी पड़ रही है। ये अंग्रेजी के विद्वान ये क्यों भूल जाते हैं कि हमारा देश सोने की चिडि़यातब कहलाता था जब न यहां अंग्रेज थे न अंग्रेजियत। किसी भाषा का जानकार होना अच्छा है। पर एक भाषा को दूसरी भाषा की सौतेली बहन बनाकर खड़ा कर देना गलत है। महानगर के कई लोग गांव कस्बे के लोगों की सोच को छोटा बताकर उनके मूल्यों और आदर्शों की खिल्ली उड़ाते हैं। यहां तक कि एक ही शहर के निवासी नए और पुराने शहर के आधार पर खुद को बंटा हुआ दिखाना पसंद करते हैं। अक्लमंदी का सर्टिफिकेट पाए हुए कुछ माननीय अपने से छोटे संघर्षशील व्यक्ति से दूरी बनाकर चलते हैं। वे अपनी जमात वालों के शिटपर भी वाह-वाह करते दिखाई पड़ते हैं लेकिन संघर्षशील व्यक्ति के टैलेण्ट को गले लगाने से हिचकिचाते हैं। ये भी भूल जाते हैं आज वे जिस जगह हैं वहां तक इसी रास्ते से होकर पहंुचे हैं। कहने का मतलब ये है कि यदि आप लोग इस क़दर बंटे हुए हैं। और बांटने-बंटने की पालिसी पर ही चलते रहना है तो फिर देश या समाज के नुकसान पर मगरमच्छ के आंसू बहाना बंद कीजिए। किसी भी तरह के बंटवारे, भेदभाव, अन्याय और गुलामी वाली व्यवस्था पर झूठा अफसोस जताने का तब तक कोई फायदा नहीं जब तक कि आप खुद भी किसी न किसी रूप में इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। अंग्रेजों के बाद अगर देशवासियों को आपस में ही अपने अधिकारों या समान अवसरों के लिए अलग-अलग धर्म, जात, क्षेत्र, भाषा और विचारों के कारण संघर्ष करना पड़े तो फिर हम आज़ाद कैसे और किन मायनों में हुए,गौर करने की जरूरत है।

Sunday, 3 August 2014

दिस इज नाट इंटरटेंमेंट आमिर!

 आप ये सोंचकर गर्व से फूलकर कुप्पा हो सकते हैं कि देश के लाखों-करोड़ों नौजवान आपको अपना ‘रोल माडल‘ मानते हैं। इस नाते साल दो साल में करोड़ों के बजट वाली एक ऐसी धांसू फिल्म सिनेमा के पर्दे पर उतारनी जरूरी है, जिससे न सिर्फ आप खुद जबरदस्त मुनाफा कमाएं साथ ही पब्लिक भी देखकर यह कह सके कि ‘चलो पैसा वसूल हुआ‘। बालीवुड के नामचीन सितारों और आज की आम नौजवान पीढ़ी के बीच रिश्ता केवल इतना ही होता तो बात कुछ और थी। पर दिक्कत ये है कि बात यहीं खत्म नहीं होती। ये आपके जैसे बोलना चाहते हैं। चलना चाहते हैं। कपड़े पहनना चाहते हैं। कुल मिलाकर आपके जैसा ही दिखना चाहते हैं। फिर इन भोलेभाले नौजवानों से ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि किसी नए प्रयोग पर ये ‘वाउ! वाट ए न्यू एक्सपेरीमेंट‘ या ‘वाट ए पीस आफ आर्ट‘ कहकर आगे बढ़ जाएंगे! जी बिल्कुल ठीक समझे आप। मैं यहां बालीवुड के सुपर स्टार के साथ-साथ एक सोशल थिंकर की इमेज बनाने वाले ‘आमिर खान‘ से मुखातिब हंू।
मानना पड़ेगा कि अपनी आगामी फिल्म ‘पीके‘ में आमिर ने बड़ा ही चैंकाने वाला दृष्य फिल्माया है जो इन दिनों चर्चा में है। चैंकाने वाला इसलिए नहीं कि इसमें एक नंग-धड़ंग, शर्म की जगह पर बड़ा सा टेपरिकार्डर लगाए बालीवुड का एक नायक खड़ा हैं। बल्कि इसलिए कि इस अवस्था में ‘दि आमिर खान‘ खड़े हैं। शायद फिल्म को प्रोमोट करने और रिकार्ड मुनाफा कमाने के लिए यही हथकंडा सबसे ज्यादा काम आने वाला है। लेकिन मेरा मानना है कि आमिर खान और उन जैसे अन्य सितारों को जो आम नौजवानों के रोल माडल हैं और एक सामाजिक चिंतक के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए खुद की सोशल इमेज और नैतिकता के साथ समझौता करना शोभा नहीं देता। फिल्म ‘गजनी‘ में जब आमिर खान ने सिर पर लम्बी लकीर खिंचवाईं थी तो मुझे याद है कि मोहल्ले में, रास्ता चलते हुए, बाजार में चार-छह नौजवान वैसे ही स्टाइल में सिर पर लकीर बनवाए हुए दिख जाते थे। उन्हें गजनी की कहानी से कोई लेना-देना नहीं था कि उसमें कैसे आमिर के सिर पर चोट लगने की वजह से वह लकीर पड़ जाती है। उन्होंने तो इसे फैशन ही माना। अब जब आमिर नंगधड़ंग खड़े हैं तो...........!!! मैं ये नहीं कहती कि सभी नंगे हो जाएंगे। शायद इतनी समझ तो है हमारे देश के किशोरों व नौजवानों में, लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर उनमें नंगेपन को लेकर शर्म खत्म हो जाए। साथ ही इस तरह के पोस्टर चाहे वे नायिकाओं के हों या नायकों के यौन उत्तेजना जगाने वाली सामग्री में जरूर गिने जा सकते हैं। इससे यौन हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है। आज जब देश में चारों तरफ यौन हिंसा की घटनाएं आम होती जा रही हैं। हमें अपनी नौजवान पीढ़ी को सम्भालने की जरूरत है। यह जिम्मेदारी भला समाज में रोल माडल की भूमिका अदा कर रहे लोगों से बेहतर कौन उठा सकता है। हालांकि एक जागरूक व्यक्ति द्वारा आमिर के इस पोस्टर के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की जा चुकी है। मेरा मानना है कि समाज के अन्य स्तंभ से भी इसके खिलाफ स्वर मुखर होने चाहिए। केवल आमिर के पोस्टर ही नहीं बल्कि इस तरह की अन्य दृष्य सामग्रियों पर रोक के लिए सख्त आदेश-निर्देश जारी होने चाहिए। उनके खिलाफ भी जो खुद मुनाफा कमाने के लिए इस तरह के विज्ञापन छापते या प्रसारित-प्रचारित करते हैं या इसकी अनुमति देते हैं। अंत में बस इतना कहना चाहते हैं कि हम किसी की प्रतिभा के खिलाफ नहीं है। ‘कयामत से कयामत तक‘ के रोमांटिक आमिर, ‘दिल‘ के आशिक आमिर, ‘लगान‘ के किसान आमिर, ‘मंगल पाण्डेय‘ के क्रातिकारी आमिर, ‘थ्री ईडिएट‘ के इनोवेटिव-क्रिएटिव आमिर और ‘सत्यमेव-जयते‘ के समाज-सुधारक आमिर बेशक काबिल-ए-तारीफ हैं।