Monday, 21 July 2014

भावनाओं के मीटर को मैनेज करो सखि

एक ओर ओपन एयर रेस्तरां में दोस्तों के साथ बैठकर पिज्जा-बर्गर खा रही हो। मल्टीप्लेक्स में 'पहले दिन का पहला शो' देख रही हो। स्कूटर-कार से सड़कों पर फर्राटे भर रही हो। स्कूल-कालेज में मिनी स्कर्ट, जींस पहनकर घूम रही हो। बार्डर पर दुश्मनों के सीने पर गोलियां दाग रही हो। हवाई जहाज से सरहदें फलांग रही हो। कबड्डी खेल रही हो, मुक्केबाजी कर रही हो। पहाड़ चढ़ रही हो। चांद पर जा रही हो। अंग्रेजी में गिटपिट कर रही हो। लैपटाप से वीडियो चैट कर रही हो। स्मार्टफोन से फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप अकाउंट हैंडिल कर रही हो.........! और दूसरी ओर........! बहलाई-फुसलाई जा रही हो, घुमाई-टहलाई जा रही हो। बहकाई-भगाई जा रही हो। रुलाई-सताई जा रही हो। डराई-धमकाई भी जा रही हो!!! कभी सोचा है क्यों? जहां तक मुझे लगता है तुमने अपने विकास के हर पहलू पर गौर किया है सिवाय भावनात्मक पहलू के। ठीक है कुदरत ने स्त्रियों के हैण्डबैग में भावनाएं-संवेदनाएं मुट्ठी भर-भरकर डाली हैं। पर क्या ये जरूरी है कि आगा-पीछा सोचे-समझे बिना इन्हें सोशल साइट के स्टेटस की तरह हर किसी ऐरे-गैरे को शेयर करती चलो.....
मैनेजमेंट के इस दौर में भावनाओं को भी मैनेज करने की सख्त जरूरत है। तुम्हें भी अपनी भावनाओं को मैनेज करना सीखना होगा। कब किससे क्या और कितनी बात करनी है,ये सलीका जब तक नहीं सीखोगी छली जाती रहोगी। तब तक ठगी जाती रहोगी जब तक कि ‘गालिब‘ की गज़ल और ‘मीर‘ के शेरों से ही रीझ जाने की अपनी आदत नहीं छोड़ देतीं। तब तक मूर्ख बनाई जाती रहोगी जब तक तुम्हारी दुनियां केवल तुम्हारे प्रेमी या पति के इर्द-गिर्द ही सिमटी रहेगी। वशिष्ठ धर्मसूत्र में लिखा है-''पिता रक्षति कौमारे, भ्राता रक्षति यौवने, रक्षति स्थविरे पुत्रा, न स्त्री स्वातंत्रमर्हति''। इसका मतलब है-कुमारी अवस्था में स्त्री की रक्षा की जिम्मेदारी पिता की। यौवन में पति की और बुढ़ापे में पुत्र की है। जमाना बदल गया पर तुम आज भी इसी सड़े-गले सिद्धांत को जी से लगाए बैठी हो।
तुम्हें अपनी सुरक्षा के लिए एक पुरुष बाडीगार्ड चाहिए ही चाहिए,ऐसा क्यों? हाथी को अंकुश से, घोड़े को चाबुक से, सींग वाले पशुओं को डंडे से वश में किया जाता है और दुष्ट व्यक्ति को नियंत्रण में करने के लिए तलवार जरूरी है। क्यों नहीं वह समझ बनातीं जो तुम्हें खतरे के प्रति पहले ही आगाह कर दे। दुष्ट लोगों को अपनी विवेक रूपी तलवार से काटो। जिस प्रकार मोबाईल में डिलीट मारने का विकल्प होता है इसी प्रकार से अपनी जि़दगी में भी अनावश्यक और कूड़े-करकट से दिल लगाकर मत बैठ जाओ बल्कि इसे मसलकर रिसाइकिल बिन में डालो। खुद को 'डायमंड इंगेजमेंट रिंग'' के घेरे से आजाद रखो। कीमती तोहफो के बदले सम्मान से समझौता न करो, जीवन के हर पहलू के प्रति खुद को अपडेट और सचेत रखो।
मुझे यकीन है कि जिस दिन तुम अपनी भावनाओं के मीटर को मैनेज करने में सफल हो गईं अखबारों की इस तरह की सुर्खियां कतई नहीं बनोगी........युवती को बहला-फुसलाकर, धोखे से, शादी का झांसा देकर, नौकरी दिलाने के बहाने,या होटल के कमरे में धोखे से बुलाकर रेप! आचार्य 'चाणक्य' कहते हैं कि गुप्त स्थान पर संभोग करना। ढीठ होना,समय-समय पर आवश्यक वस्तुएं संगृहीत करना, निरंतर सावधान रहना और किसी दूसरे पर पूरी तरह विश्वास नहीं करना, ये पांच बातें कौए से सीखनी चाहिए। और मुझे लगता है आचार्य जी के सिधांत आज भी प्रासंगिक हैं। शो-केस में सजाने वाली संुदर,सुशील, सहनशील, मृदभाषी, मुस्कुराती हंसनियां बनना बंद करो। भावनात्मक स्तर से चालाक कौवी बनो इससे कम से कम तुम्हें यह मलाल तो नहीं रहेगा कि तुम अपनी मूर्खता की वजह से किसी अनहोनी की भेंट चढ़कर अकाल मौत मर गईं।
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1 comment:

  1. बहुत सामयिक, बहुत तर्कपूण, शिॅक्षाप्रद, आलेख, बधाई

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