Friday, 25 July 2014

एक रोशन सितारा मायका और ससुराल

सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में नई जानकारी शामिल होने वाली है। बच्चों इसे अपने ज्ञानकोश में जल्दी-जल्दी शामिल कर लो, क्योंकि कई प्रतियोगिताओं में पूछा जाने वाला है-क्या आप जानते हैं-‘देश के नए 29वें राज्य ‘तेलंगाना‘ का ‘ब्रांड एम्बेसडर‘ कौन है? अरे लेकिन रूको.....रूको...... बताउं कि नहीं कि उत्तर क्या है? उंह बता ही देती हंू......तुम्हारा क्या है? तुम तो मासूम हो! लिंगभेद,छल-कपट, जात-पात और खासतौर से राजनीति, इन शब्दों से कोसों दूर! ये थोड़ी समझते हो कि अपने देश में बेटी को ‘पराया धन‘ माना जाता है। मतलब कि ‘बेटी घर बाबुल के किसी और की अमानत है‘। अब अगर शादी के पहले ही बेटी गैर की अमानत तो फिर शादी के बाद तथाकथित असली मालिक के पास पहंुच जाने पर मायके वाले उसे कैसे अपना मान सकते हैं? भले ही बेटी कितनी ही हुनरमंद क्यों न हो। तो क्या हुआ कि उसने पूरे विश्व में अपने मायके रूपी देश का सिर गर्व से ऊचा किया हो।  दरअसल अपने यहां ‘बेटी डोली में ससुराल जाती है और अर्थी में वापस आती है‘ वाली ‘माईथौलजी‘ पर सिर फोड़ने वालों की कमी नहीं है। इन्हें तो यह मलाल होगा कि शत्रुदेश में निकाह होने के बाद खुदा न करे, उसकी अर्थी मायके क्यों नहीं लौटी। ताकि ये दो पड़ोसियों के बी नफरत की आग को और भड़का सकें। इन्हें ये कैसे सुझाई देगा कि मंुबई में उसका जन्म हुआ था और वह हैदराबाद की बेटी है। छह साल की उम्र से उसने टेनिस खेलना शुरू कर दिया। कई अंतरराष्टीय टेनिस मैचों में हिस्सा लेकर देश की आम लड़कियों के लिए रोल माॅडल बनी। 2003 में वाइल्ड कार्ड एंटरी से विंबलंडल में डबल्स के दौरान फतह हासिल करके सबको चैंकाया। 2004 में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए ‘अर्जुन पुरस्कार‘ से सम्मानित की गई। 2009 में भारत की तरफ से ‘ग्रैंड स्लैम‘ जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनी। मुस्लिम परिवार को बिलांग करते हुए, जहां लड़कियों को बुरका पहनाकर उनका दायरा सीमित कर दिया जाता है खुद को स्थापित किया।

Monday, 21 July 2014

भावनाओं के मीटर को मैनेज करो सखि

एक ओर ओपन एयर रेस्तरां में दोस्तों के साथ बैठकर पिज्जा-बर्गर खा रही हो। मल्टीप्लेक्स में 'पहले दिन का पहला शो' देख रही हो। स्कूटर-कार से सड़कों पर फर्राटे भर रही हो। स्कूल-कालेज में मिनी स्कर्ट, जींस पहनकर घूम रही हो। बार्डर पर दुश्मनों के सीने पर गोलियां दाग रही हो। हवाई जहाज से सरहदें फलांग रही हो। कबड्डी खेल रही हो, मुक्केबाजी कर रही हो। पहाड़ चढ़ रही हो। चांद पर जा रही हो। अंग्रेजी में गिटपिट कर रही हो। लैपटाप से वीडियो चैट कर रही हो। स्मार्टफोन से फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप अकाउंट हैंडिल कर रही हो.........! और दूसरी ओर........! बहलाई-फुसलाई जा रही हो, घुमाई-टहलाई जा रही हो। बहकाई-भगाई जा रही हो। रुलाई-सताई जा रही हो। डराई-धमकाई भी जा रही हो!!! कभी सोचा है क्यों? जहां तक मुझे लगता है तुमने अपने विकास के हर पहलू पर गौर किया है सिवाय भावनात्मक पहलू के। ठीक है कुदरत ने स्त्रियों के हैण्डबैग में भावनाएं-संवेदनाएं मुट्ठी भर-भरकर डाली हैं। पर क्या ये जरूरी है कि आगा-पीछा सोचे-समझे बिना इन्हें सोशल साइट के स्टेटस की तरह हर किसी ऐरे-गैरे को शेयर करती चलो.....

Sunday, 20 July 2014

वह 80 मीटर तक फैला खून देखकर कहती है......!

वह सुन्न बैठी है अभी उसी सरकारी स्कूल की बाहरी दीवार पर। एकटक देख रही है अपने 80 मीटर दूर तक फैले गाढ़े-लाल खून को। वह देख रही है अपनी नग्न पड़ी लाश को। उस परिसर और उस हैण्डपम्प को भी, जहां उसके साथ हुई दरिंदगी के निशान जगह-जगह चस्पा हैं। वह सुन रही है उन चीथड़ों की फड़फड़ाहट जो तड़प रहे हैं उसकी उस डरावनी रात की बेबसी पर। वह सिसकते हुए हाथ जोड़कर कह रही है तमाशबीनों से.......माफ करो! नहीं लेना मुझे जन्म दोबारा तुम्हारी इस धरती पर। क्या करूंगी आकर ऐसी धरती पर जहां बेटियों की बोटी-बोटी नोंचकर इंसान कहलाने वाले वहशी दरिंदे अपनी वासना का पेट भरते हैं। ये क्या बेटियों की सुरक्षा वाले कानून के ढकोचले फैला रखे हैं। तुम पर भरोसा किया तो जरूर फिर उठा ली जाउंगी किसी चलती-फिरती सडक से और मुझे निवस्त्र करके मर्दानगी के सबूत दिए जाएंगे। बालों से पकड़कर घसीटा जाएगा। डंडों-लाठियों से पीटा जाएगा। बहाया जाएगा मेरे जिस्म में दौड़ रहे खून का कतरा-कतरा और मेरी चित्कार न पहंुच सकेगी किसी के कानों तक। न समय रहते तुम तक न गंूगी-बहरी कानून व्यवस्था के कानों तक! अब तुम ही बताओ कि जन्म ही क्यों लंू मैं इस धरती पर अपनी मौत का ऐसा वीभत्स तमाशा देखने को? इससे तो मैं उस गंदे नाले में अच्छी जहां जन्म से पहले मेरे भ्रूण को काले थैले में लपेटकर फेंक दिया जाता है।
मैं जब सयानी हो रही थी, भ्रम हो चला था कि मेरे एक नहीं कई रक्षक हैं। मेरे जैविक माता-पिता के अलावा मेरे देश-प्रदेश और शहर की कानून व्यवस्था। यही सोंचकर तो मैंने घर से बाहर स्कूल-काॅलेज, बाजार, दफतर के लिए कदम निकाले थे। मुझे क्या पता था कि इस धरती पर भेडि़ये खुले घूम रहे हैं और इनके पैरों में ज़जीरे डालने वाली सत्ता भोग-विलास में मस्त है। पर अब ये सब सोचने से भी क्या फायदा क्योंकि लचर कानून-व्यवस्था और अपराधियों की बर्बरता की बलि चढ़ चुकी है मेरी देह। इसलिए अब हाथ जोड़कर फरियाद ही कर सकती हंू, अपनी उन सभी बहनों की सुरक्षा के लिए जो इस ‘भारत मां‘ कहलाने वाली अंधेरी और जंगली धरती पर पहले से ही जन्म ले चुकी हैं या लेने वाली हैं.......!
पहली फरियाद उनसे जो बड़े ही सभ्य-शांत तरीके से मोमबत्तियां जलाकर मेरी शांति की दुआ मांगने का स्वांग रचाने वाले हैं। मैं कहना चाहती हंू उनसे कि देखो सभ्यता और शांति का ढ़ोंग उनके लिए करना जो शांति से मरी हैं। मैं तो इतनी वीभत्स मौत मरी हंू कि मौत भी मुझे साथ ले जाते हुए चीखें मार-मारकर रो रही थी, बस तुम ही लोग सुन नहीं सके। मुझसे ज़रा भी हमदर्दी है तो वादा करो कि सड़कों पर उतरोगे मेरे लिए। वादा करो कि सत्ता के गलियारों में घुसकर, जिम्मेदारों की छाती पर चढ़कर,घंूसे मार-मारकर सोई हुई कानून व्यवस्था को जगाओगे। मिलेगी कुछ शांति मुझे तब, जब कानून की बेल्ट अपराधियों की खाल उधेड़ेगी। 
दूसरी फरियाद उन सत्ताधारियों से जो मेरे बलात्कार पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले हैं। मैं हाथ जोड़ती हंू उनके आगे कि इस बार तरस खाकर ही सही, कुछ ऐसा जरूर करना जिससे इंसानियत फिर कभी शर्मसार न हो। वरना सच मानों आम बेटियों की चिता पर तुम इसी तरह बंसी बजाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब दरिंदों के हाथ तुम्हारी बेटियों के गरीबां तक भी पहंुचेंगे।
तीसरी फरियाद है उन माओं से जो बड़े नाज और नखरों से बेटों को पालती-पोसती तो हैं लेकिन उन्हें ये नहीं सिखातीं कि खुद उन्हें दुनियां में लाने वाली इस हाड़-मांस की स्त्री को अपनी मर्जी से जीने का अधिकार है। यकीन मानों कि तुम यंू ही अपनी कोख से बेटे पैदा करके उन्हें जंगली झाड़ की तरह पलने-बढ़ने दोगी तो एक दिन ये तुम्हारी देह नोंचने से भी बाज नहीं आएंगे। मिलेगी मुझे मुक्ति अब तभी, जब  किसी पुरुष का वजूद किसी स्त्री के पतन और विनाश का कारण नहीं बनेगा। दे सकते हो मुझे वादा......! अगर हां तो मैं सोचंूगी फिर से तुम्हारी गोद में किलकारियां भरने को, सोचंूगी आंगन में खेलने को, यानी फिर से जन्म लेने को अन्यथा अब बंद कर देना ये गीत गुनगुनाना भी कि......ओ री चिरैया,नन्हीं सी चिडि़या.....अंगना में फिर आ जा रे................!!!