Saturday, 14 June 2014

आरक्षण दिलाएगा 'इज्जत से जीने' की गारंटी..!

संसद के संयुक्त सत्र में राष्टपति का महिलाओं को संसदीय एवं प्रशासनिक पदों पर 33 फीसदी आरक्षण देकर आगे लाने का वादा आधी आबादी को बेहतर कल की उम्मीद बंधाने वाला है। उम्मीद इस बात की कि देश में सर्वोच्च पदों पर महिलाओं का ज्यादा से ज्यादा वर्चस्व होगा तो इनके जरिए आधाी आबादी की आवाज असरदार तरीके से सत्ता पर विराजमान नीति-निर्णायकों के कानों तक पहंुचेगी। इसकी उम्मीद कि मां की कोख में बेटियों को जीवित रहने और जन्म लेने की गारण्टी मिलेगी। गरीब और दबे-कुचले परिवार में जन्म लेने के बावजूद पोषणयुक्त भोजन मिलेगा। वे आगे बढ़ेंगी, पढेंगी। घर से बाहर निकलने पर सुरक्षित घर वापस लौट सकेंगी। योग्यतानुसार नौकरियां पाएंगी। ससुराल में दहेज न ले जाने पर भी सुखी वैवाहिक जीवन जी सकेंगी। कुल मिलाकर उम्मीद इस बात की कि प्रधानमंत्री ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी‘ की ओर से दिखाए गए अच्छे दिनों का सपना साकार हो सकेगा। हालांकि सैकड़ों उम्मीदों के पूरा होने की राह में जो बेशुमार रोड़े हैं उनको कैसे उखाड़ फेंका जाएगा यह सवाल बड़ी मजबूती से सिर उठाए खड़ा है।
देश में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में संघर्ष और प्रयास तो आजादी से पहले ही शुरू हो चुके थे। इस दिशा में कई चुनौतियों पर विजय भी हासिल हुई है। लेकिन आजादी के 66 सालों के बाद भी जारी इस सफर की रफतार बहुत धीमी है। महिलाओं के हक में सैकड़ों कानून और योजनाएं लागू किए जाने के बाद भी आधी आबादी की दशा शोचनीय है। ‘कन्या भ्रूण हत्या‘ के खिलाफ सख्त कानून लागू होने के बाद भी देश में प्रत्येक वर्ष सात लाख बेटियों मां के गर्भ में ही मारी जा रही हैं। इससे स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में असमानता है। प्रति एक हजार लड़कों के अनुपात में 940 लड़कियां हैं जिससे कई इलाकों में तो शादी के लिए लड़कियां ही नहीं मिल रही हैं। ‘नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो‘ के मुताबिक प्रतिवर्ष 20 हजार से ज्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे हैं। आठ हजार से ज्यादा दहेज हत्याएं हो रही हैं। पति और रिश्तेदारों द्वारा हिंसा व प्रताड़ना की शिकार महिलाओं का ग्राफ एक लाख का आंकड़ा पार कर चुका है। ‘यूनिसेफ‘ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 50 फीसदी किशोरियां एनिमिक हैं। यानि उनके जिस्म में खून की कमी है। 40 फीसदी से ज्यादा लड़कियां 18 साल की होने से पहले ही ब्याह दी जाती हैं और 22 फीसदी मां बन जाती हैं।
यह स्थिति तब है जब वर्तमान समय में लोक सभा में महिलाओं का फीसद 11 तो राज्य सभा में 10.6 है। 188 देशों के बीच राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के संदर्भ में भारत का स्थान 108वां है। हालांकि मोदी सरकार देश की कमान सम्भालने के बाद से ही इस स्थिति को और सुधारने के प्रयास करती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने जिस तरह अपने मंत्रिमंडल में करीब 25 फीसदी महिलाओं को जगह दी। विदेश मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए ‘सुषमा स्वराज‘ और ‘लोकसभा स्पीकर‘ के लिए सुमित्रा महाजन के नाम पर मोहर लगाई, इससे ‘महिला सशक्तिकरण‘ को लेकर उनकी नीयत साफ-सुथरी जान पड़ती है। संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा होने के बाद अब लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पास होने और इसपर राष्टपति की मुहर लगने की देरी है। जबकि राज्यसभा में यह बिल पहले ही पास हो चुका है। कदम सराहनीय है लेकिन 33 फीसदी आरक्षण मिलने के बाद आरक्षित सीटों को भरने के लिए राजनैतिक पार्टियों को महिलाओं के लिए दिल बड़ा करने की जरूरत पड़ेगी। आज भी चुनाव में पर्याप्त संख्या में महिलाओं को टिकट नहीं दिए जा रहे। जबकि कई राजनैतिक पार्टियों में ‘महिला विंग‘ तक नहीं हैं। दूसरी ओर सत्ताधारी महिलाओं को भी अपनी जिम्मेदारी की गंभीरता को समझना होगा। सकारात्मक नतीजे भी तभी प्राप्त हो सकेंगे जब सत्ता में भागीदारी रखने वाली महिलाएं स्वंय पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित हुए बिना अपने फर्ज को अंजाम दें। क्षेत्रीय एवं दलगत राजनीति से उपर उठकर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करें, फैसले लें। भारतीय समाज में उपरी और दिखावटी नहीं बल्कि भीतरी बदलाव लाने की कोशिशें की जाएं। सत्ता को पुरखों की विरासत के रूप में सौंपने का चलन बंद हो। केवल ‘रायल ब्लड‘ को ही तरजीह न दी जाए बल्कि समाज के दबे-कुचले और गरीब तबकों की महिलाओं का भी संसदीय एवं प्रशासनिक पदों पर स्वागत किया जाए।
कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख
फोटोः गूगल से साभार

Wednesday, 11 June 2014

सावधान! अकाल डूब मरते हैं "खतरों के खिलाड़ी"

सुनहरे कल के न जाने कितने ख्वाब देख डाले होंगें, उन आंखों ने जिन्होंने अभी-अभी तो दुनिया को देखना-समझना, परखना, जांचना शुरू किया था। अभी तो बस शुरू ही हुआ था सफर हौसलों की उंगली थामकर खुद को साबित करने का। सफर माता-पिता या परिवार की हसरतों को परवान चढ़ाने का। अभी तो बढ़ाए थे मंजिल की ओर चंद कदम इस उम्मीद के साथ कि जीत लेना है सारे जहां को अपने जोश और उमंग से। अभी तो लहराना था उन्हें नीले आकाश में अपनी जीत का परचम लेकिन अफसोस.....!उनकी आंखें मुंद गईं वक्त से पहले ही और इन आखों के मंुदने के साथ ही मंुद गए वे सभी ख्वाब, जो उनसे वाबस्ता थे बस चंद रोज पहले तक ही....!!! ‘ब्यास नदी‘ में 24 जवां जिंदगियों के डूबने के साथ ही डूब गईं ये सारी उम्मीदें और ख्वाब।
उत्तरांचल का ताजा ‘लार्जी डैम हादसा‘ यंू तो देश में होने वाले उन तमाम हादसों की गिनती में इजाफा करता है जो प्रशासन की लापरवाही के कारण होते हैं,लेकिन जब सवाल आज की पढ़ी-लिखी, जागरूक युवा पीढ़ी का हो तो गौर-ओ-फिक्र कुछ गहरी होनी चाहिए कि आखिर क्यों ये युवा जोश में होश गवां बैठने की गलती कर गए या इन जैसे कई अन्य युवा भी अक्सर कर जाया करते हैं? क्या इसके लिए युवाओं को परोसे गए बेलगाम और जिंदगी जैसी बेशकीमती चीज से खिलवाड़ करना सिखाने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों और विज्ञापनों या फिल्मों को भी दोष नहीं दिया जाना चाहिए। आपने भी इस तरह के कार्यक्रम घर पर चाय की चुस्कियां लेते हुए कभी न कभी तो जरूर देखे होंगे। एक शीतल पेय के विज्ञापन का उदाहरण देती हंू-पंच लाइन है-‘डर के आगे जीत है‘। इस विज्ञापन में युवा उन सीमाओं को पार करते नजर आते हैं जहां पहंुचकर इंसान की रूह अक्सर थर्रा जाया करती है। सधे-सधाए लोगों के लिए तो ठीक है,लेकिन इस तरह के विज्ञापनों का अनुसरण करना साधारण लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे विज्ञापनों की नकल करने से घर के भीतर तो हम बच्चों को रोक देते हैं,लेकिन बाहर हमारे युवा बच्चे ‘एडवेंचर‘ के चक्कर में कब अपनी जान से खिलवाड़ कर बैठें इसका इल्म हमें नहीं हो पाता। हाल ही में रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘जवानी दीवानी‘, कैटरीना कैफ की मल्टी स्टारर फिल्म ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा‘ भी युवाओं को जान का जोखिम लेने की सीख देने वाली हैं। अभिनेता अक्षय कुमार व निर्देशक रोहित शेट्टी की ओर से होस्ट किए जाने वाला रियलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी‘ भी इसी कड़ी में शामिल है। शो के ताजा सीजन के एपिसोड की शुरुआत में ही रोहित शेट्टी यह दर्शाते कहते दिखाई देते हैं कि ‘हम उन सीमाओं के पार जाकर खतरों से खेलेंगे जहां अक्सर चेतावनी देने वाले बोर्ड लगे होते हैं‘। इस तरह के प्रचार और मनोरंजन पर रोक लगनी चाहिए।
क्या हुआ हादसाः
आठ जून को हैदराबाद के एक ‘इंजीनियरिंग कालेज‘ के छात्र कालेज की ओर से टूर पर निकले थे। हिमाचल प्रदेश के मंडी इलाके में लार्जी डैम के पास नदी के बीचोबींच उतरकर उनमें से कुछ युवा मौज-मस्ती करने लगे, वे फोटो खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे कि अचानक लार्जी डैम से पानी छोड़ दिया गया। इससे नदी का जल स्तर काफी बढ़ गया और तेज बहाव में करीब 24 युवा बह गए। सर्च आपरेशन में अब तक आठ शव बरामद.

Tuesday, 10 June 2014

विकास की स्पीड पर भारी बेटियों की चीखें!

दो बहनों से सामूहिक बलात्कार के बाद पेड़ से लटकाया। सामूहिक बलात्कार के बाद लड़की को तेजाब पिलाया। युवती से सामूहिक बलात्कार के बाद जलाया। प्रेमी युगल पेड़ से लटकाकर फांसी दी। छह साल की बच्ची से रेप! इन दिनों यूपी की यह दिल दहला देने वाली तस्वीर उभरकर सामने आई है। यहां बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। लड़कियां घर से कदम निकालने के नाम पर सहम रही हैं। जाहिर है इस तरह की खबरें सुनकर तो सभ्य समाज के इंसानी दिल दहल ही जाने चाहिए। रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए। दिन का सुकून और रातों की नींद उड़ जानी चाहिए पर अफसोस महिलाओं के साथ बर्बरता पर कानून व्यवस्था के जिम्मेदारों की सेहत पर कोई असर होता नहीं दिखाई दे रहा। प्रदेश की बेटियों के साथ क्रूर से क्रूरतम अपराध घटित हो रहे हैं। सत्ताधारी या रसूख-दबदबे वाले लोग त्वरित और कड़ी कार्रवाई के बजाय अपराधियों के हौसले बुलंद करने वाले बयान दे रहे हैं। सवाल पूछे जाने पर प्रदेश की सत्तारूढ़ सरकार के मुखिया कहते हैं-‘‘हम अपना काम कर रहे हैं, आप अपना काम कीजिए‘‘। पर हकीकी मायनों में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े काम हो रहे होते तो कानून-व्यवस्था की चूलें इस कदर ढ़ीली न होतीं। प्रतिदिन कम से कम 10 बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में न आतीं। सिसकियां ले रही कराह रही बेटियों की चीखों की गंूज दूसरे देशों तक न पहंुचती। संयुक्त राष्ट के महासचिव ‘बान की मून‘ की ओर से बदायंू की बर्बरता पर कार्रवाई की मांग न की जाती। भारत में महिलाओं पर हो रही हिंसा पर अमेरिका हैरानी न जताता। पर देश की छवि खराब होती है तो क्या सत्ता का नशा उतरने वाला नहीं। यह तो सिर चढ़कर बोल रहा है। जिम्मेदार तो कहते हैं कि और जगहों पर भी बलात्कार होते हैं। उत्तर प्रदेश को बेवजह ही निशाना बनाया जा रहा है। यानि यह कोई खास बाद नहीं। हल्ला मचाने की कोई जरूरत नहीं। हद हो गई महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर संवेदनहीनता की। बदायंू में दो नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार और उनकी नृशंस हत्या कर पेड़ से लटकाए जाने का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ। सभी आरोपी पकड़े तक नहीं गए कि मुज्जफरनगर, अमेठी, मेरठ, गुड़गांव, राजस्थान, सहित प्रदेश और देश के अन्य इलाकों से भी मासूम बच्चियों और युवतियों के साथ बलात्कार के दो दर्जन से ज्यादा मामले प्रकाश में आए गए। हद तो यह है कि महिला मुख्यमंत्री वाले प्रदेश राजस्थान में भी बलात्कार के मामले प्रकाश में आ रहे हैं। जहां आरोप-प्रत्यारोप से ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने का दौर चल पड़ा हो वहां वसंुधरा राजे भी यह कहकर पल्ला झाड़ सकती हैं कि यूपी से भयावह स्थिति तो राजस्थान की नहीं है।
देश-प्रदेश की बेटियां खून के आंसू रो रही हैं पर आम जनता की रहनुमाई व हिफाजत के दावे करने वाले नेता महिलाओं की अस्मत की चिता पर भी राजनीति की रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। घटनास्थल पर हेलीकाॅप्टर से उतरते हैं। मिनरल वाॅटर पीते हैं। एसी गाडि़यों में बैठकर बलात्कार पीडि़त लड़कियों के घर का टूर करते हैं लेकिन इसके बाद भी अपनी ताकत और पद का इस्तेमाल अगला बलात्कार रोकने में नहीं कर पाते। लानत है ऐसे रसूख पर जो कमजोर व निर्बल की रक्षा न कर सके। मीडियावालों! बलात्कारों पर ब्रेकिंग न्यूज दे देकर विकास का मंुह ताक रहे दूर-दराज के गावों में मेले चाहे जितने लगवा लो। बाॅलीवुड वालों तुम क्यों रह गए। तुम भी आओ, बदायंू और उन्नाव की वीभत्स सत्य घटनाओं और उसपर चल रही नौटंकी पर ‘पीपली लाइव-टू-थ्री, बना लो। कुछ नहीं होने वाला। कुछ नहीं बदलने वाला। क्योंकि विश्व पटल पर संवेदनशीलता का ढ़ोंग रचाने वाला हमारा देश हकीकत में रोबोटिक युग में प्रवेश कर गया है। हम विदेशी ढर्रों का अनुसरण करते हुए डिब्बाबंद लंच-डिनर ले रहे हैं। ब्रांडेड पोशाकें पहन रहे हैं। हमारे पास बीएमडबल्यू और फेरारी जैसी कारें हैं। बस नहीं है तो स्त्री के प्रति संवेदना। वह भावनाएं नहीं हैं जो पर स्त्री को भी अपनी मां, बहन बेटी की तरह देखने की दृष्टि प्रदान करे। देश की गरीब और आम बेटियां भी यह बात जितनी जल्दी समझ लें उनके लिए उतना ही अच्छा रहेगा। क्योंकि उन्हें अपनी सुरक्षा के उपायों पर खुद ही विचार-विमर्श करना होगा। कठोर कदम उठाने होंगे। उन्हें समझना होगा कि हमारे देश-प्रदेश का शासकीय व सत्ताधारी तंत्र नपंुसक हो चला है, जो बेटियों की सुरक्षा की दिशा में कोई सकारात्मक फल देने में लाचार नजर आता है। क्या हुआ जो देश की छवि खराब हो रही है। इसकी मरम्मत सत्ताधारी अपनी कूटनीति से बाद में कर ही लेंगे।
जब किसी ‘वैश्विक महिला सम्मेलन‘ में विदेश से बुलावा आएगा तो बेटियों की तरक्की से संबंधित तमाम आंकड़े इकट्ठे करके फेहरिस्त पढ़कर सुना देंगे। बता देंगे कि यूपी में दलित समुदाय से अपनी पहचान बनाने वाली बहनजी मायावती भारत की उपलब्धि हैं। जिन्होंने बतौर मुख्यमंत्री प्रदेश की कमान चार बार सम्भाली है। वह दलित समुदाय की बेटियों के अधिकारों की झण्डाबरदार हैं। सीनातानकर कह देंगे कि वर्तमान समय में विधानसभा में 35 महिला एमपी हैं। देश के पास चार महिला मुख्यमंत्री हैं। आमचुनाव-2014 से 61 महिला सांसद चुनकर लोकसभा में भेजी गई हैं। अच्छे दिनों का सपना दिखाने वाले प्रधानमंत्री मोदी हैं। उनकी कैबिनेट में भी सात शक्तिशाली महिलाओं को जगह दी गई है। हमारे पास दो दर्जन से ज्यादा एक्सप्रेस-वे हैं। हम डबल डेकर फलाई ओवरों का निर्माण कर रहे हैं। हमने अग्नि-5 जैसी मिसाइल बना ली है। महिलाओं को खेत-खलिहानों में शौच के लिए न जाना पड़े इसके लिए ‘निर्मल ग्राम‘ योजना है। तो क्या हुआ योजना के लागू होने के बाद भी प्रचार ज्यादा और काम कम हुआ है। ग्रामीण इलाकों के 50 फीसदी घरों में शौचालय का निर्माण नहीं हो सका है। आप ये बलात्कार-वलात्कार जैसी बेकार की चर्चाएं छोडि़ए हमारे विकास के दूसरे पहलुओं पर नजर डालिए और तालियां बजाईए।
‘कल्पतरु एक्सप्रेस‘ में प्रकाशित लेख। फोटो ‘गूगल‘ से साभार।



दरिंदों का आसान शिकार क्यों बन रहीं प्रदेश की बेटियां

कितना गर्व महसूस करते हैं उन बेटियों के माता-पिता जब परीक्षा परिणाम घोषित होते हैं और बधाई मिलती है कि मुबारक को आपकी बेटी ने जिले या प्रदेश में टाॅप किया है। हां यह आजकल की बेटियां ही तो हैं जो शिक्षा हासिल करने से लेकर जीवन के हर मोर्चे पर कामयाबी के झण्डे गाड़कर यह साबित कर रही हैं कि वे किसी से कम नहीं। बेटियों की इस कामयाबी का श्रेय घर-परिवार वालों सहित हमारा समाज,शहर, प्रदेश और यहां तक कि देश भी लेना नहीं भूलता। अखबार में खबर छपती है कि फलां-फलां शहर की बेटी ने नाम रोशन किया। पितृसत्तात्मक समाज में लम्बे संघर्ष के बाद अपनी काबलियत के दम पर बेटियां आज अपनी पहचान बनाने में सक्षम हैं। ऐसे में तो यह बेटियां प्रोत्साहन और ईनाम की हकदार बनती हैं। फिर क्यंू इन्हें तिरस्कार, अपमान और अस्मत लुट जाने का भय बांटा जा रहा है। क्यों ऐसे घिनौने और दिल दहला देने वाले काण्ड अंजाम दिए जा रहे हैं कि इन बेटियों के आगे बढ़ते कदम ठिठकने को मजबूर हैं। बेटियों को सरेआम रास्ते से उठा लेना। उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म करना और फिर मारकर पेड़ से लटका देने जैसा जघन्य अपराध विकासशील देशों की रेस में तेजी से आगे बढ़ते हुए भारत के लिए बेहद शर्मनाक और भर्तसनीय है।
एक ओर बेटियों की तरक्की के लिए तमाम तरह की योजनाएं चलाई जाती हैं। उनके हाथों में स्मार्टफोन और लैपटाॅप थमाए जाते हैं। उनकी इच्छाओं को पंख देने के दावे किए जाते हैं और दूसरी ओर सैकड़ों परिवारों को बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं कराई जातीं। शौचालय नहीं मुहैया कराए जाते। बदायंू में दो चचेरी बहनें शाम के वक्त घर से शौच करने ही निकली थीं। सरकारी अधिकारी खुद यह बयान देते हैं कि ग्रामीण और दूर-दराज के घरों में शौचालय न होने के कारण ज्यादातर बलात्कार की घटनाएं घटित होती हैं। वाह रे आधूनिकता, वाह रे तरक्की! शासन-प्रशासन का यह कैसा दोमंुहापन है। बदायंू मामले में पुलिसकर्मी लिप्त पाए गए हैं। यह उत्तर प्रदेश के पुलिसियातंत्र के मुंह पर एक तरह से कालिख पुतना है। मामले में पीडि़त परिवार की ओर से सीबीआई जांच की मांग और इस मांग का चैतरफा समर्थन भी उत्तर प्रदेश पुलिस की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है। जिस प्रदेश का मुखिया बलात्कार के संदर्भ में यह बयान दे कि लड़के हैं गलती हो जाती है उस प्रदेश में बेटियों के साथ बलात्कार जंगल में खरगोश का शिकार करने जैसा आसान हो जाए तो हैरानी की क्या बात है! पुलिस की ओर से अपराधिक मामलों में सुनवाई में देरी करना। पीडि़त पक्ष को ही मारपीटकर भगा देना। अपराधियों के साथ मिलकर अपराध को अंजमा देने से ही दबंगों और अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। आयदिन बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं। बंदायंू, आजमगढ़, बागपत, मुज्जफरनगर और आगरा सहित महीनेभर में उत्तर प्रदेश से दर्जनभर से ज्यादा सामूहिक बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं और लगातार आना जारी हैं।
बदायंू में बलात्कार की शिकार दो बहनों में से एक लड़की के पिता ने कहा-‘‘जिस तरीके से हमारी लड़कियों को पूरी दुनिया ने लटके देखा, हम चाहते हैं कि वह दोषियों को भी फांसी के फंदे पर लटके देखे‘‘। यानि वे दोषियों के लिए सरेआम फांसी से कम सजा नहीं चाहते। चाहना भी नहीं चाहिए। भारतीय कानून में इससे भी कड़ी सजा का प्राविधान यदि होता तो पीडि़त और संवेदनशील लोग बंदायंू जैसे वीभत्स काण्ड के दोषियों के लिए जरूर मांग करते। लेकिन इसके बाद भी बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून सख्त कर देने और देश के अंतिम पीडि़त व्यक्ति की पहंुच न्याय तक बना देने से बेटियों के साथ बलात्कार की घटनाएं घटित होना बंद हो जाएंगी? जवाब हां या न में कोई नहीं दे सकता। क्योंकि महिलाओं पर अत्याचार के लिए हमारा पूरा सामाजिक ताना-बाना और घर परिवार में बेटा-बेटी की परवरिश में भेदभाव भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। महिलाओं के लिए समग्ररूप से जबतक सामाजिक और पारिवारिक सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक बात नहीं बनने वाली।
बदायंू जैसे काण्ड का एक पिछला उदाहरण याद आता है। दिल्ली के ‘निर्भया काण्ड‘ को अभी इतना वक्त नहीं बीता कि इसकी यादें धंुधली पड़ जाएं। चलती बस में मेडिकल छा़त्रा के साथ मारपीट की गई। सामूहिक बलात्कार हुआ। जिसके कारण कुछ दिन बाद लड़की की मौत हो गई। देशभर खासतौर से दिल्ली में इस काण्ड के खिलाफ देशभर में पुरजोर तरीके से आवाज उठाई गई। मामले की जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित की गई। फास्ट टैक कोर्ट में मामला चलाया गया। नतीजे में छह दिन के भीतर आरोपी पकड़े गए। बिना पंचनामा पोस्टमार्टम हुआ। सात महीने में 130 सुनवाई हुईं। पुलिस ने 88 गवाह पेश किए गए। इंटरनेशनल वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बयान दिलवाए गए। चार आरोपियों को फांसी की सजा हुई। जनता के दबाव पर और इस घटना का संज्ञान लेते हुए ही बलात्कार के खिलाफ कानून में बदलाव किया गया। आईपीसी की धारा-376-ई, के तहत अधिकतम सजा मृत्युदंड कर दी गई। मामले को आज भी ‘‘निर्भया केस‘‘ नाम से जाना जाता है। निर्भया केस में जिस तरह से त्वरित कार्रवाई और दोषियों को सजा हुई उससे कानून पर महिलाओं का भरोसा पक्का हो चला था। पर इसके बाद क्या हुआ? विश्वास फिर टूटा। महिलाओं और नाबालिग लड़कियों की अस्मत से खिलवाड़ नहीं रुका। निर्भया केस के बाद पहले आठ महीनों में ही दिल्ली में एक हजार से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। बदायंू मामले में भी सीबीआई जांच की सिफारिश खुद प्रदेश सरकार की ओर से कर दी गई है। अपराधी पकड़े गए हैं। फास्ट टैक कोर्ट में मामला चलाने के आदेश दिए गए हैं। सम्भव है कि निर्भया केस की ही तरह इस मामले में भी दोषियों को फांसी की सजा दिलाने में कामयाबी मिल जाए पर सवाल फिर वही है कि क्या इसके बाद पुलिस का रवैया सुधरेगा। बलात्कार नहीं होंगे!
परिवार और समाज भी हैं जिम्मेदार
दरअसल भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष की समानता और कंधे से कंधा मिलाकर चलने की ज़बानी पैरोकारी तो बहुत होती है लेकिन भीतरी और जमीनी हकीकत जुदा है। जहां बेटा-बेटी को समान परवरिश देने की बात आती है वहां आज भी करोड़ों माता-पिता और समाज और धर्म के कथित ठेकेदारों के सुर बदल जाते हैं।  महिलाओं के अपमान,हिंसा और यहां तक सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के पीछे कहीं न कहीं हमारे भारतीय परिवारों में बेटियों को दबाकर रखने और बेटों की अराजकता को मर्दाना फितरत कहकर टाल देने प्रवृत्ति जिम्मेदार है।
 ‘कल्पतरु एक्सप्रेस‘ में प्रकाशित लेख। फोटो ‘गूगल‘ से साभार।