Sunday, 25 May 2014

अधूरा है अभी आधी आबादी का सफर

गजरा,टीका, सिंदूर, बिंदिया,आई लाइनर,आई षेडो,काजल,बेस पाउडर,फेस पाउडर,क्रीम,लिप लाइनर,लिपिस्टिक,कान में बाला,गले में मंगलसूत्र,हाथों में चूडियां,मेंहदीं,नाखून पाॅलिष, कमरबंद,पैरों में पायल और बिछिया। उफ! कम से कम इतना तो श्रंगार करती ही हैं, भारतीय दुल्हनें। बैंकिंग सेक्टर में काम करने वाली सहेली की षादी पर उसे इतना ही सजे देखकर पूछा क्या तुम इतना सब करने के बाद सहज महसूस कर रही होघ् उसका जवाब था षादी कर रही हंू, आज तो सबसे अच्छा लगने का हक बनता है मेरा। मैंने ठंडी सांस भरते हुए मनही मन कहा- बिना साज श्रंगार तुम खुद ही अपने आप को पसंद नहीं करतीं तो किसी और को दोश क्या देना। तुम समझतीं क्यंू नहीं कि यह हीनता की भावना बाजार के पितामाह ठूंस रहे हैं तुम्हारे अंर्तमन में। यह बात तुम्हारे मन में घर कर जाए कि तुममे कोई कमी है, जिसके लिए तुम्हारा मेकओवर जरूरी है, तभी तो लिपिस्टिक,पाउडर,गहने-कपडों और ऐन-तेन का बाजार फले-फूलेगा। तुम इन गडबडझालों में उलझी रहो। अपनी रंगी-पुति क्षवि देखकर खुष होती रहो और अपने असल मुद्दों से तुम्हारा ध्यान बंटा रहे ताकि बाजार में तुम्हें एक कमोडिटी की तरह पेष किया जा सके यही तो पित्र सत्ता और पंूजीवादी लोगों की चाल है।
षिक्षित और हाई-प्रोफाईल समुदाय के लोगों के बीच महिलाओं को उनके पति के नाम से जाने जाने का खास तरह का चलन बडा पुराना है। हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अक्सर महिलाएं एक दूसरे को मिसेज भाटिया, मिसेज षर्मा, मिसेज खान वगैरह-वगैरह के सम्बोधन से बुलाती हैं। महिलाओं को यह बात चुभती क्यों नहीं ! षादी के बाद इस तहर के प्रोटोकाॅल निभाने वाली कोई महिला क्या इस बात की गारण्टी दे सकती है कि उसका पति सदा उनका ही  बनकर रहेगा। अपने नाम के आगे पति का नाम जोड़नेे से पति बेवफाई नहीं करेगा। अगर तुम ष्योर नहीं तो फिर  खुद के नाम के बजाय मिसेज फलाने -ढिमका कहलाने, लिखने का क्या फायदा।
महिलाएं जितना समय सामाजिक-धार्मिक आडम्बर निबटाने में लगाती हैं उतने समय में अपने अधिकारों के बारे में जानें तो उनके साथ होने वाली षारीरिक ,मानसिक और आर्थिक हिंसा काफी हद तक कम हो जाए। धर्म षास्त्रों ने  तो महिला को दोयम दर्जे का पराश्रित और असहाय बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी है। यहां महिला पुरूश की दासी ही बताई जाती है। जब महिलाओं के बढ़ते कदमों को घर-पति, बच्चों और समाज की दुहाई देकर भी रोकना नामुमकिन हो जाता है तब उन्हें धर्म का डर दिखाया जाता है। महिलाओं के लिए गीता, कुरआन और बाइबिल में फलां-फलां उपदेष की दलीलें दी जाती हैं।
कामकाजी हो तब भी घर की साफ-सफाई या खाना पत्नी ही बनाए।  बच्चों का लालन-पालन करे, पति और सास-ससुर की सेवा करे, क्योंघ् क्योंकि यह सब काम निचले दर्जे के हैं पुरूश के अंह को ठेस पहंुचाते और महिलाओं पर ही जंचते हैं। आंटी, बुआ ताई चाची  या मामी आप किसी से पूछकर देख लीजिए लगभग यही जवाब मिलना तय है। पति-पत्नी दोनों के कामकाजी होने पर असमय मेहमान घर पर आ जाएं या कोई घर का सदस्य बीमार पड जाए तो आॅफिस से छुट्टियां लेने का दायित्व भी पत्नी जी का ही है। षहर से बाहर जाने, देर रात तक घर से बाहर रहने की भी अनुमति अभी मध्यमवर्गीय परिवारों में तो महिलाओं को नहीं मिलती। यह सब चोचले तो हाई-प्रोफाईल महिलाओं के समझे जाते है। ऐसे अवसरों के लिए पत्नी की देह के एकाधिकारी पति को बाॅडीगार्ड बनाकर  साथ ले जाना पड़ता है। ऐसा न करने पर उन्हें खुद भी आत्मग्लानि होने लगती है। क्योंकि बचपन से ही उन्हें इस तरह के नियम-कायदे सिखाए जाते हैं। आज वे तो बस इस बात से ही बेहद खुष हैं कि उन्हें काम करने के लिए घर की दहलीज पार करने की अनुमति मिली हुई है।बेचारी सषक्त महिला!
सिनेमा वगैरह में महिलाओं की सषक्त छवि दिखाना पर उस छवि को सामाजिक पटल पर स्वीकार करना दो अलग-अलग बातें हैं। यह एक  अजीब किस्म का दोहरापन है। यंू तो भारतीय सिनेमा पष्चिमी सिनेमा की धड़ल्ले से नकल पीट रहा है,लेकिन सिर्फ अष्लीलता के पैमाने पर। जब बात स्त्री पुरूश की बराबरी की आती है  तो यह पलटी मार जाता है। काॅकटेल फिल्म की कहानी कुछ ऐसी ही हकीकत दर्षाती है। फिल्म की कहानी के मुताबिक आदर्ष पत्नी बनने की रेस में वह महिला हार जाती है जो पुरूशों के समकक्ष बिंदास जीवन जीती है। षराब पीती है। लेट नाइट डिस्को जाती है। ब्वाॅयफ्रेंड से सेक्स करती है। लिव इन रिलेषन में रहती है,लेकिन जब षादी की बारी आती है तो उसका ब्वाॅयफ्रेंड एक सीधी सादी, घरेलू टाइप महिला के लिए उसे छोड़ देता है। फिल्म मेकर यही कहते हैं  िक वे वही दिखाते हैं जो समाज की हकीकत है। यानि फिल्म संदेष देती है कि हमारे समाज में किसी की पत्नी बहू बनने के लिए सलवार कुर्ता पहनना, खाना बनाना,भगवान में विष्वास करना ,यौवन की पवित्रता बनाए रखने जैसी क्वालीफिकेषन जरूरी  है। सो काॅल्ड खुले विचारों के लोग तो चाहते हैं कि इसके साथ ही अगर लड़की जाॅब भी कर रही हो तो सोने पर सुहागा। ये सब बातें पुरूशों पर लागू नहीं होतीं।
टेलिविजन पर इस तरह के विज्ञापन प्रसारित होना आम बात हैं कि न्यू ब्रांड परफयूम या डियोडरेंट  लगाकर महिलाओं के सामने से पुरूश गुजर जाएं तो वे महज इनकी खुषबू से मदहोष होकर अपना षील भंग कर सकती हैं।  इस तरह की विक्रित मानसिकता का संदेष देनेवाले विज्ञापनों का हिस्सा बनने से महिलाओं को परहेज करना चाहिए। उन्हें यह समझ बनानी होगी कि इसी तरह की पंूजीवादी सोच खुद महिलाओं को महिलावाद के खिलाफ खड़ा करती है। इन विज्ञापनों में काम करने वाली महिलाओं से मैं मनरेगा  के तहत काम करने वाली उस महिला को सषक्त  कहंूगी जो गारा-मिट्टी ढ़ोकर जीविका चलाती है।  एक काॅलोनी में मैंनें दो किस्म की महिलाएं देखीं एक जो  पति के लात-जूते दिन-रात इसलिए खाती है क्योंकि वह उसका और उसके बच्चों का पेट पालता है। इस महिला ने मानों अपना अपमान करवाना स्वीकार कर लिया है। षायद इसलिए वह कहती है कि आदमी को गुस्सा आएगा तो वह बीवी पर ही तो निकालेगा और कहां जाएगा! जूते खाकर भी अत्याचारी पति की पक्षदारी। मुझे लगता है ऐसी पतिव्रता स्त्रियां तो केवल हमारे देष में ही पाई जाती हैं।  दूसरी ओर उसी काॅलोनी में रहने वाली उस महिला से भी मैं मिली हंू जिसने पति के आयदिन की मारकुटाई और गालियों से तंग आकर तलाक ले ली। तलाक से पहले यह गाढे़ किस्म की घरेलू महिला थी लेकिन तलाक के दो साल बाद ही आज अपनी जीविका स्वंय चला रही है और षान से जी रही है। समाज महिलाओं के लिए तलाक को जितना बुरा मानता है, दरअसल वह इतना बुरा है नहीं। महिलाओं को जरूरत है तो सिर्फ अपनी षक्ति पहचानकर जुल्म के खिलाफ उठ खड़े होने की।
बच्चे का होमवर्क कराना हो,पैरेंट-टीचर मीटिंग अटेंड करनी हो  या एनुअल डे निबटाना हो तो मम्मी फस्र्ट लेकिन काॅलेज के एडमिषन फार्म, पहचानपत्र पर पापा का नाम ही  लिखना अनिवार्य है। कहीं-कहीं मम्मी का भी है, लेकिन पापा के नीचे वाले काॅलम में। रसोई सम्भाले मां या पत्नी पर राषनकार्ड में मुखिया के काॅलम में पति या ससुर का नाम । मतदाता पहचानपत्र अथवा आधार कार्ड में वाइफ आॅफ  या डाॅटर आॅफ वाले काॅलम में पति या पिता का नाम  भरता अनिवार्य है। यानि पुरूश के नाम के बिना हमारा सरकारी तंत्र भी महिलाओं  को उनकी पहचान नहीं दे सकता। महिला कामकाजी हो तब भी नहीं। सरकारी दस्तावेजों में वह आज भी पराश्रित ही है।
कहने का आषय यह है कि आधी आबादी ने घर की दहलीज लांघने, स्कूल-काॅलेज में षिक्षा हासिल करने और विभिन्न क्षेत्रों में जीविका कमाने तक के सफर के लिए मीलों का फासला तय किया है। कितने बंधन तोडे हैं,कितने आंदोलन छेड़हैं और न जाने कितने टकराव झेले लेकिन  महज घर से निकलकर काम करने वाली महिला को देखकर महिलाएं तो बड़ी सषक्त होगईं हैं, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। महिलाओं के प्रति पित्रसत्तात्मक सोच को बदलने के लिए अभी बाकी का सफर बहुत लम्बा और कहीं ज्यादा मुष्किलभरा है।  महिलाओं को खुद भी सषक्तिकरण के प्रति अपनी समझ को विस्तार देना होगा। धर्म, परम्परा और रिवाज के नाम पर अनदेखे-अनजाने बंधन अभी अनगिनत हैं। जिनको तोड़ने  के लिए लड़ाई अभी और लम्बी  चलनी हैं।
नोट.हिन्दी दैनिक  कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाषित लेख
फोटोःसर्च इंजन गूगल से साभार

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