Tuesday, 20 May 2014

कहानी-नया सवेरा


वसंत का महीना था। चारों ओर हरियाली थी। सुबह की ठंडी-ठडी हवाएं वातावरण में सिहरन पैदा कर रही थीं। आम, फलेंदा, बेर और गुल मोहर केे पेड़ों पर रंग-बिरंगी चिडि़यां ऐसे चहचहा रही थीं जैसे बारात के आने पर दुल्हन की सहेलियां शोर मचाने लगती हैं। खेतों में तैयार सरसों की फसल इठला रही थी। आकाश में छिटकी लाली सूर्योदय का पता दे रही थी। आधे पक्के, आधे कच्चे घर के भीतर खटिया पर सोई हुई सांवली रंगत,तीखे नैन नक्श व लम्बे-घनेबालों वाली नवयौवना गहरी नींद में सोई हुई थी। दूर के मंदिर से आती हुई घंटियो और भजन की आवाज से अचानक उसकी नींद टूटी। यह थी ‘संध्या‘।
संध्या इस वर्ष हाई-स्कूल की परीक्षा दे रही थी। वह प्रतिदिन प्रातःकाल पांच बजे उठकर अध्ययन करती थी। संध्या का मानना था कि प्रातःकाल पढ़ने से पाठ पक्का याद हो जाता है। आंखे मलते हुए संध्या ने खटिया के सिरहाने पड़ी अपनी ओढ़नी उठाई और उसे गले में लपेटते हुए झट से उठकर बैठ गई। उसने अपने अगल-बगल नजर दौड़ाई। दूसरी खटिया पर उसके अम्मा और बाउ जी दोनों गहरी नींद में सो रहे थे। अम्मा को ‘घोड़े बेचकर सोया‘ देख संध्या का मन नहीं हुआ कि वह उन्हें खेत तक साथ चलने के लिए जगाए। दरअसल संध्या के घर में शौचालय नहीं था। संध्या ही क्या उसके गांव के अधिकतर घरों में शौचालय की सुविधा नहीं थी। यही कारण था कि गांव जहां एक ओर प्राकृतिक संपदा से भरपूर था तो वहीं दूसरी ओर गांव में फैली गंदगी उसकी संुदरता में दाग लगा रही थी। गांव के लोगों को खेत-खलिहान जाकर ही नित्यक्रिया से निपटना होता था। संध्या शौच के लिए सदा अम्मा के साथ ही खेत पर जाया करती थी। पर आज उसने अम्मा को चैन से सोते देखकर नहीं जगाया और अकेले ही पानी का लोटा लेकर खेत की ओर चल दी।
संध्या के घर से खेत यही कोई आधा किलोमीटर की दूरी पर थे। तेज-तेज कदमों से चलते हुए वह थोड़ी ही देर में गंतव्य तक पहंुच गई। वह नित्यक्रिया के लिए उपयुक्त स्थान खोज रही थी। जल्द ही उसे खेत के एक ओर घनी झाडियां दिखाई दे गईं। उसने सलवार नितंबों से नीचे खिसकाई और झट से झाडि़यों में घुस गई। संध्या मन ही मन परीक्षा के लिए तैयार किए हुए उत्तर भी दोहरा रही थी। अचानक उसे अपनी कमर के दोनों ओर किसी के हाथों का स्पर्श महसूस हुआ। संध्या घबरा कर जोरदार झटके से पलटी लेकिन इतनी देर में उसे स्पर्श करने वाले व्यक्ति ने झाडि़यों में ही चित कर दिया। संध्या अर्धनग्न अवस्था में बदहवास सी पड़ी हुई थी। वह चीख भी नहीं सकती थी। क्योंकि स्पर्श करने वाले व्यक्ति ने उसका मंुह अपने एक हाथ से बंद कर रखा था। संध्या ने देखा कि वह व्यक्ति कोई और नहीं उसके घर दूध पहंुचाने वाला अधेड़उम्र का ननकू था। संध्या कामेच्छा में अंधे ननकू से खुद को बचाने की पूरी कोशिश कर रही थी। इसी जद्दोजहद में वह साथ लाया हुआ पीतल का लोटा उठाने में सफल हो गई। आव देखा न ताव उसने अपनी पूरी ताकत से लोटे को ननकू के सिर पर दे मारा। ननकू के सिर से खून की धार बह निकली। वह वहीं झाडि़यों में ढेर हो गया। बदहवास संध्या ने अपनी सलवार तेजी से कमर पर बांधी और घर की ओर सरपट दौड़ पड़ी।
हांफती हुई संध्या घर के भीतर दाखिल हुई तो देखा अम्मा और बाउ जी अभी भी सोए हुए थे। उसने जल्दी से अपने कपडे़ ठीक करते हुए हाथ-मंुह धोया, पानी पिया और अम्मा के चरणों में बैठकर घुटी-घुटी आवाज से रोने लगी। आहट से अम्मा की आंख खुल गई। इतनी देर में संध्या की सांसें काफी हद तक काबू में आ चुकी थीं। अम्मा ने चारपाई से उठते हुए पूछा-‘‘अरी संधू क्या आज परीक्षा देने नहीं जाना? सवेरा हो गया और तूने मुझे जगाया भी नहीं! चल पहले खेत हो आते हैं।‘‘ संध्या बिना कुछ उत्तर दिए ही अम्मा की छाती से चिपक गई। अम्मा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-‘‘क्या हुआ बिटिया कोई परेसानी है का।‘‘ मासूम संध्या ने आंखें भींचकर जवाब दिया-‘‘नहीं अम्मा आज अंग्रेजी की परीक्षा है न थोड़ा डर लग रहा है।‘‘ संध्या ने अपने आंसू छिपा लिए थे। इस डर से कि यादि वह सबकुछ अम्मा को बता देगी तो गांव में बडा हंगामा खड़ा हो जाएगा। अंग्रेजी का पर्चा तो छूटेगा ही बदनामी होगी सो अलग। यह सब सोंचकर उसने अपने साथ हुए यौन हमले की बात को फिलवक्त मन में ही दफन कर देना उचित समझा।
गर्मी अपने चरम पर थी। संध्या के साथ हुए यौन हमले को काफी दिन बीत चुके थे। संध्या घर के पिछवाड़े खपरैल वाले सेहन में व्याकुलता से चहल-कदमी कर रही थी। आज उसके परीक्षा परिणाम घोषित होने वाले थे। तभी उसकी सहेली गरिमा वहां पहंुची। उसने ‘‘मोबाईल इंटरनेट‘‘ के माध्यम से पता लगाकर संध्या को खुशखबरी दी कि परीक्षा में वह प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई है। संध्या ने यह सुनकर खुशी से उछलते हुए गरिमा को गले लगा लिया। इतने में उसकी अम्मा और बाउ जी भी जो बेटी की दिनरात की मेहनत का नतीजा जानने के लिए उतावले थे वहां आ पहंुचे। संध्या के बापू ने झट से बेटी का माथा चूमा और पूछा कि ‘‘बिटिया तोहका उपहार में का चाही?‘‘ संध्या के मंुह से अनायास ही निकला ‘‘बाउजी घर में शौचालय बनवा दो।‘‘
संध्या ने बताया कि उसने टेलीविजन पर विज्ञापन में देखा है कि सरकार ‘‘निर्मल भारत अभियान योजना‘‘ के तहत ग्रामीण लोगों के घर में शौचालय निर्माण में मदद कर रही है। इसका जिम्मा ग्राम पंचायतों को सौंपा गया है। ग्राम पंचायत से बात की जाए तो उनके घर भी शौचालय बन सकता है। संध्या के बाउ जी ने कहा, ठीक है। मैं आज ही जाकर ग्राम प्रधान से बात करूंगा। संध्या के पिता ने वादे के मुताबिक ग्राम प्रधान से योजना की पूरी जानकारी ली और जल्द ही संध्या के घर शौचालय बनकर तैयार हो गया। अब संध्या के घर से कोई भी नित्यक्रिया के लिए खेतों में नहीं जाता था। यही वह समय था जब संध्या ने अपनी सहेली गरिमा और अपनी अम्मा से यौन हमले की बात बताई। संध्या की अम्मा ने उसके बाउजी से सब बता दिया। बाउजी ने थाने जाकर ननकू के खिलाफ रपट लिखवाई लेकिन ननकू पहले से ही पकड़े जाने के डर से गांव से फरार हो चुका था। जबकि संध्या और गरिमा ने साथ मिलकर गांव की अन्य लड़कियों को भी अपने-अपने घरों में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया। कुछ माह में ही संध्या के गांव के अधिकतर घरों में शौचालय बनकर तैयार हो गए।

नोटः जागरुकता के अभाव और सरकारी योजनाओं की विफलता के चलते आज भी हजारों महिलाएं खुले में शौच करने को मजबूर हैं। यह स्थिति शिष्टाचार के खिलाफ तो है ही, इससे महिलाओं पर दुराचार व यौन हमलों को भी बढ़ावा मिलता है।


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