Sunday, 25 May 2014

अधूरा है अभी आधी आबादी का सफर

गजरा,टीका, सिंदूर, बिंदिया,आई लाइनर,आई षेडो,काजल,बेस पाउडर,फेस पाउडर,क्रीम,लिप लाइनर,लिपिस्टिक,कान में बाला,गले में मंगलसूत्र,हाथों में चूडियां,मेंहदीं,नाखून पाॅलिष, कमरबंद,पैरों में पायल और बिछिया। उफ! कम से कम इतना तो श्रंगार करती ही हैं, भारतीय दुल्हनें। बैंकिंग सेक्टर में काम करने वाली सहेली की षादी पर उसे इतना ही सजे देखकर पूछा क्या तुम इतना सब करने के बाद सहज महसूस कर रही होघ् उसका जवाब था षादी कर रही हंू, आज तो सबसे अच्छा लगने का हक बनता है मेरा। मैंने ठंडी सांस भरते हुए मनही मन कहा- बिना साज श्रंगार तुम खुद ही अपने आप को पसंद नहीं करतीं तो किसी और को दोश क्या देना। तुम समझतीं क्यंू नहीं कि यह हीनता की भावना बाजार के पितामाह ठूंस रहे हैं तुम्हारे अंर्तमन में। यह बात तुम्हारे मन में घर कर जाए कि तुममे कोई कमी है, जिसके लिए तुम्हारा मेकओवर जरूरी है, तभी तो लिपिस्टिक,पाउडर,गहने-कपडों और ऐन-तेन का बाजार फले-फूलेगा। तुम इन गडबडझालों में उलझी रहो। अपनी रंगी-पुति क्षवि देखकर खुष होती रहो और अपने असल मुद्दों से तुम्हारा ध्यान बंटा रहे ताकि बाजार में तुम्हें एक कमोडिटी की तरह पेष किया जा सके यही तो पित्र सत्ता और पंूजीवादी लोगों की चाल है।
षिक्षित और हाई-प्रोफाईल समुदाय के लोगों के बीच महिलाओं को उनके पति के नाम से जाने जाने का खास तरह का चलन बडा पुराना है। हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अक्सर महिलाएं एक दूसरे को मिसेज भाटिया, मिसेज षर्मा, मिसेज खान वगैरह-वगैरह के सम्बोधन से बुलाती हैं। महिलाओं को यह बात चुभती क्यों नहीं ! षादी के बाद इस तहर के प्रोटोकाॅल निभाने वाली कोई महिला क्या इस बात की गारण्टी दे सकती है कि उसका पति सदा उनका ही  बनकर रहेगा। अपने नाम के आगे पति का नाम जोड़नेे से पति बेवफाई नहीं करेगा। अगर तुम ष्योर नहीं तो फिर  खुद के नाम के बजाय मिसेज फलाने -ढिमका कहलाने, लिखने का क्या फायदा।
महिलाएं जितना समय सामाजिक-धार्मिक आडम्बर निबटाने में लगाती हैं उतने समय में अपने अधिकारों के बारे में जानें तो उनके साथ होने वाली षारीरिक ,मानसिक और आर्थिक हिंसा काफी हद तक कम हो जाए। धर्म षास्त्रों ने  तो महिला को दोयम दर्जे का पराश्रित और असहाय बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी है। यहां महिला पुरूश की दासी ही बताई जाती है। जब महिलाओं के बढ़ते कदमों को घर-पति, बच्चों और समाज की दुहाई देकर भी रोकना नामुमकिन हो जाता है तब उन्हें धर्म का डर दिखाया जाता है। महिलाओं के लिए गीता, कुरआन और बाइबिल में फलां-फलां उपदेष की दलीलें दी जाती हैं।
कामकाजी हो तब भी घर की साफ-सफाई या खाना पत्नी ही बनाए।  बच्चों का लालन-पालन करे, पति और सास-ससुर की सेवा करे, क्योंघ् क्योंकि यह सब काम निचले दर्जे के हैं पुरूश के अंह को ठेस पहंुचाते और महिलाओं पर ही जंचते हैं। आंटी, बुआ ताई चाची  या मामी आप किसी से पूछकर देख लीजिए लगभग यही जवाब मिलना तय है। पति-पत्नी दोनों के कामकाजी होने पर असमय मेहमान घर पर आ जाएं या कोई घर का सदस्य बीमार पड जाए तो आॅफिस से छुट्टियां लेने का दायित्व भी पत्नी जी का ही है। षहर से बाहर जाने, देर रात तक घर से बाहर रहने की भी अनुमति अभी मध्यमवर्गीय परिवारों में तो महिलाओं को नहीं मिलती। यह सब चोचले तो हाई-प्रोफाईल महिलाओं के समझे जाते है। ऐसे अवसरों के लिए पत्नी की देह के एकाधिकारी पति को बाॅडीगार्ड बनाकर  साथ ले जाना पड़ता है। ऐसा न करने पर उन्हें खुद भी आत्मग्लानि होने लगती है। क्योंकि बचपन से ही उन्हें इस तरह के नियम-कायदे सिखाए जाते हैं। आज वे तो बस इस बात से ही बेहद खुष हैं कि उन्हें काम करने के लिए घर की दहलीज पार करने की अनुमति मिली हुई है।बेचारी सषक्त महिला!
सिनेमा वगैरह में महिलाओं की सषक्त छवि दिखाना पर उस छवि को सामाजिक पटल पर स्वीकार करना दो अलग-अलग बातें हैं। यह एक  अजीब किस्म का दोहरापन है। यंू तो भारतीय सिनेमा पष्चिमी सिनेमा की धड़ल्ले से नकल पीट रहा है,लेकिन सिर्फ अष्लीलता के पैमाने पर। जब बात स्त्री पुरूश की बराबरी की आती है  तो यह पलटी मार जाता है। काॅकटेल फिल्म की कहानी कुछ ऐसी ही हकीकत दर्षाती है। फिल्म की कहानी के मुताबिक आदर्ष पत्नी बनने की रेस में वह महिला हार जाती है जो पुरूशों के समकक्ष बिंदास जीवन जीती है। षराब पीती है। लेट नाइट डिस्को जाती है। ब्वाॅयफ्रेंड से सेक्स करती है। लिव इन रिलेषन में रहती है,लेकिन जब षादी की बारी आती है तो उसका ब्वाॅयफ्रेंड एक सीधी सादी, घरेलू टाइप महिला के लिए उसे छोड़ देता है। फिल्म मेकर यही कहते हैं  िक वे वही दिखाते हैं जो समाज की हकीकत है। यानि फिल्म संदेष देती है कि हमारे समाज में किसी की पत्नी बहू बनने के लिए सलवार कुर्ता पहनना, खाना बनाना,भगवान में विष्वास करना ,यौवन की पवित्रता बनाए रखने जैसी क्वालीफिकेषन जरूरी  है। सो काॅल्ड खुले विचारों के लोग तो चाहते हैं कि इसके साथ ही अगर लड़की जाॅब भी कर रही हो तो सोने पर सुहागा। ये सब बातें पुरूशों पर लागू नहीं होतीं।
टेलिविजन पर इस तरह के विज्ञापन प्रसारित होना आम बात हैं कि न्यू ब्रांड परफयूम या डियोडरेंट  लगाकर महिलाओं के सामने से पुरूश गुजर जाएं तो वे महज इनकी खुषबू से मदहोष होकर अपना षील भंग कर सकती हैं।  इस तरह की विक्रित मानसिकता का संदेष देनेवाले विज्ञापनों का हिस्सा बनने से महिलाओं को परहेज करना चाहिए। उन्हें यह समझ बनानी होगी कि इसी तरह की पंूजीवादी सोच खुद महिलाओं को महिलावाद के खिलाफ खड़ा करती है। इन विज्ञापनों में काम करने वाली महिलाओं से मैं मनरेगा  के तहत काम करने वाली उस महिला को सषक्त  कहंूगी जो गारा-मिट्टी ढ़ोकर जीविका चलाती है।  एक काॅलोनी में मैंनें दो किस्म की महिलाएं देखीं एक जो  पति के लात-जूते दिन-रात इसलिए खाती है क्योंकि वह उसका और उसके बच्चों का पेट पालता है। इस महिला ने मानों अपना अपमान करवाना स्वीकार कर लिया है। षायद इसलिए वह कहती है कि आदमी को गुस्सा आएगा तो वह बीवी पर ही तो निकालेगा और कहां जाएगा! जूते खाकर भी अत्याचारी पति की पक्षदारी। मुझे लगता है ऐसी पतिव्रता स्त्रियां तो केवल हमारे देष में ही पाई जाती हैं।  दूसरी ओर उसी काॅलोनी में रहने वाली उस महिला से भी मैं मिली हंू जिसने पति के आयदिन की मारकुटाई और गालियों से तंग आकर तलाक ले ली। तलाक से पहले यह गाढे़ किस्म की घरेलू महिला थी लेकिन तलाक के दो साल बाद ही आज अपनी जीविका स्वंय चला रही है और षान से जी रही है। समाज महिलाओं के लिए तलाक को जितना बुरा मानता है, दरअसल वह इतना बुरा है नहीं। महिलाओं को जरूरत है तो सिर्फ अपनी षक्ति पहचानकर जुल्म के खिलाफ उठ खड़े होने की।
बच्चे का होमवर्क कराना हो,पैरेंट-टीचर मीटिंग अटेंड करनी हो  या एनुअल डे निबटाना हो तो मम्मी फस्र्ट लेकिन काॅलेज के एडमिषन फार्म, पहचानपत्र पर पापा का नाम ही  लिखना अनिवार्य है। कहीं-कहीं मम्मी का भी है, लेकिन पापा के नीचे वाले काॅलम में। रसोई सम्भाले मां या पत्नी पर राषनकार्ड में मुखिया के काॅलम में पति या ससुर का नाम । मतदाता पहचानपत्र अथवा आधार कार्ड में वाइफ आॅफ  या डाॅटर आॅफ वाले काॅलम में पति या पिता का नाम  भरता अनिवार्य है। यानि पुरूश के नाम के बिना हमारा सरकारी तंत्र भी महिलाओं  को उनकी पहचान नहीं दे सकता। महिला कामकाजी हो तब भी नहीं। सरकारी दस्तावेजों में वह आज भी पराश्रित ही है।
कहने का आषय यह है कि आधी आबादी ने घर की दहलीज लांघने, स्कूल-काॅलेज में षिक्षा हासिल करने और विभिन्न क्षेत्रों में जीविका कमाने तक के सफर के लिए मीलों का फासला तय किया है। कितने बंधन तोडे हैं,कितने आंदोलन छेड़हैं और न जाने कितने टकराव झेले लेकिन  महज घर से निकलकर काम करने वाली महिला को देखकर महिलाएं तो बड़ी सषक्त होगईं हैं, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। महिलाओं के प्रति पित्रसत्तात्मक सोच को बदलने के लिए अभी बाकी का सफर बहुत लम्बा और कहीं ज्यादा मुष्किलभरा है।  महिलाओं को खुद भी सषक्तिकरण के प्रति अपनी समझ को विस्तार देना होगा। धर्म, परम्परा और रिवाज के नाम पर अनदेखे-अनजाने बंधन अभी अनगिनत हैं। जिनको तोड़ने  के लिए लड़ाई अभी और लम्बी  चलनी हैं।
नोट.हिन्दी दैनिक  कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाषित लेख
फोटोःसर्च इंजन गूगल से साभार

Tuesday, 20 May 2014

कहानी-नया सवेरा


वसंत का महीना था। चारों ओर हरियाली थी। सुबह की ठंडी-ठडी हवाएं वातावरण में सिहरन पैदा कर रही थीं। आम, फलेंदा, बेर और गुल मोहर केे पेड़ों पर रंग-बिरंगी चिडि़यां ऐसे चहचहा रही थीं जैसे बारात के आने पर दुल्हन की सहेलियां शोर मचाने लगती हैं। खेतों में तैयार सरसों की फसल इठला रही थी। आकाश में छिटकी लाली सूर्योदय का पता दे रही थी। आधे पक्के, आधे कच्चे घर के भीतर खटिया पर सोई हुई सांवली रंगत,तीखे नैन नक्श व लम्बे-घनेबालों वाली नवयौवना गहरी नींद में सोई हुई थी। दूर के मंदिर से आती हुई घंटियो और भजन की आवाज से अचानक उसकी नींद टूटी। यह थी ‘संध्या‘।
संध्या इस वर्ष हाई-स्कूल की परीक्षा दे रही थी। वह प्रतिदिन प्रातःकाल पांच बजे उठकर अध्ययन करती थी। संध्या का मानना था कि प्रातःकाल पढ़ने से पाठ पक्का याद हो जाता है। आंखे मलते हुए संध्या ने खटिया के सिरहाने पड़ी अपनी ओढ़नी उठाई और उसे गले में लपेटते हुए झट से उठकर बैठ गई। उसने अपने अगल-बगल नजर दौड़ाई। दूसरी खटिया पर उसके अम्मा और बाउ जी दोनों गहरी नींद में सो रहे थे। अम्मा को ‘घोड़े बेचकर सोया‘ देख संध्या का मन नहीं हुआ कि वह उन्हें खेत तक साथ चलने के लिए जगाए। दरअसल संध्या के घर में शौचालय नहीं था। संध्या ही क्या उसके गांव के अधिकतर घरों में शौचालय की सुविधा नहीं थी। यही कारण था कि गांव जहां एक ओर प्राकृतिक संपदा से भरपूर था तो वहीं दूसरी ओर गांव में फैली गंदगी उसकी संुदरता में दाग लगा रही थी। गांव के लोगों को खेत-खलिहान जाकर ही नित्यक्रिया से निपटना होता था। संध्या शौच के लिए सदा अम्मा के साथ ही खेत पर जाया करती थी। पर आज उसने अम्मा को चैन से सोते देखकर नहीं जगाया और अकेले ही पानी का लोटा लेकर खेत की ओर चल दी।
संध्या के घर से खेत यही कोई आधा किलोमीटर की दूरी पर थे। तेज-तेज कदमों से चलते हुए वह थोड़ी ही देर में गंतव्य तक पहंुच गई। वह नित्यक्रिया के लिए उपयुक्त स्थान खोज रही थी। जल्द ही उसे खेत के एक ओर घनी झाडियां दिखाई दे गईं। उसने सलवार नितंबों से नीचे खिसकाई और झट से झाडि़यों में घुस गई। संध्या मन ही मन परीक्षा के लिए तैयार किए हुए उत्तर भी दोहरा रही थी। अचानक उसे अपनी कमर के दोनों ओर किसी के हाथों का स्पर्श महसूस हुआ। संध्या घबरा कर जोरदार झटके से पलटी लेकिन इतनी देर में उसे स्पर्श करने वाले व्यक्ति ने झाडि़यों में ही चित कर दिया। संध्या अर्धनग्न अवस्था में बदहवास सी पड़ी हुई थी। वह चीख भी नहीं सकती थी। क्योंकि स्पर्श करने वाले व्यक्ति ने उसका मंुह अपने एक हाथ से बंद कर रखा था। संध्या ने देखा कि वह व्यक्ति कोई और नहीं उसके घर दूध पहंुचाने वाला अधेड़उम्र का ननकू था। संध्या कामेच्छा में अंधे ननकू से खुद को बचाने की पूरी कोशिश कर रही थी। इसी जद्दोजहद में वह साथ लाया हुआ पीतल का लोटा उठाने में सफल हो गई। आव देखा न ताव उसने अपनी पूरी ताकत से लोटे को ननकू के सिर पर दे मारा। ननकू के सिर से खून की धार बह निकली। वह वहीं झाडि़यों में ढेर हो गया। बदहवास संध्या ने अपनी सलवार तेजी से कमर पर बांधी और घर की ओर सरपट दौड़ पड़ी।
हांफती हुई संध्या घर के भीतर दाखिल हुई तो देखा अम्मा और बाउ जी अभी भी सोए हुए थे। उसने जल्दी से अपने कपडे़ ठीक करते हुए हाथ-मंुह धोया, पानी पिया और अम्मा के चरणों में बैठकर घुटी-घुटी आवाज से रोने लगी। आहट से अम्मा की आंख खुल गई। इतनी देर में संध्या की सांसें काफी हद तक काबू में आ चुकी थीं। अम्मा ने चारपाई से उठते हुए पूछा-‘‘अरी संधू क्या आज परीक्षा देने नहीं जाना? सवेरा हो गया और तूने मुझे जगाया भी नहीं! चल पहले खेत हो आते हैं।‘‘ संध्या बिना कुछ उत्तर दिए ही अम्मा की छाती से चिपक गई। अम्मा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-‘‘क्या हुआ बिटिया कोई परेसानी है का।‘‘ मासूम संध्या ने आंखें भींचकर जवाब दिया-‘‘नहीं अम्मा आज अंग्रेजी की परीक्षा है न थोड़ा डर लग रहा है।‘‘ संध्या ने अपने आंसू छिपा लिए थे। इस डर से कि यादि वह सबकुछ अम्मा को बता देगी तो गांव में बडा हंगामा खड़ा हो जाएगा। अंग्रेजी का पर्चा तो छूटेगा ही बदनामी होगी सो अलग। यह सब सोंचकर उसने अपने साथ हुए यौन हमले की बात को फिलवक्त मन में ही दफन कर देना उचित समझा।
गर्मी अपने चरम पर थी। संध्या के साथ हुए यौन हमले को काफी दिन बीत चुके थे। संध्या घर के पिछवाड़े खपरैल वाले सेहन में व्याकुलता से चहल-कदमी कर रही थी। आज उसके परीक्षा परिणाम घोषित होने वाले थे। तभी उसकी सहेली गरिमा वहां पहंुची। उसने ‘‘मोबाईल इंटरनेट‘‘ के माध्यम से पता लगाकर संध्या को खुशखबरी दी कि परीक्षा में वह प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई है। संध्या ने यह सुनकर खुशी से उछलते हुए गरिमा को गले लगा लिया। इतने में उसकी अम्मा और बाउ जी भी जो बेटी की दिनरात की मेहनत का नतीजा जानने के लिए उतावले थे वहां आ पहंुचे। संध्या के बापू ने झट से बेटी का माथा चूमा और पूछा कि ‘‘बिटिया तोहका उपहार में का चाही?‘‘ संध्या के मंुह से अनायास ही निकला ‘‘बाउजी घर में शौचालय बनवा दो।‘‘
संध्या ने बताया कि उसने टेलीविजन पर विज्ञापन में देखा है कि सरकार ‘‘निर्मल भारत अभियान योजना‘‘ के तहत ग्रामीण लोगों के घर में शौचालय निर्माण में मदद कर रही है। इसका जिम्मा ग्राम पंचायतों को सौंपा गया है। ग्राम पंचायत से बात की जाए तो उनके घर भी शौचालय बन सकता है। संध्या के बाउ जी ने कहा, ठीक है। मैं आज ही जाकर ग्राम प्रधान से बात करूंगा। संध्या के पिता ने वादे के मुताबिक ग्राम प्रधान से योजना की पूरी जानकारी ली और जल्द ही संध्या के घर शौचालय बनकर तैयार हो गया। अब संध्या के घर से कोई भी नित्यक्रिया के लिए खेतों में नहीं जाता था। यही वह समय था जब संध्या ने अपनी सहेली गरिमा और अपनी अम्मा से यौन हमले की बात बताई। संध्या की अम्मा ने उसके बाउजी से सब बता दिया। बाउजी ने थाने जाकर ननकू के खिलाफ रपट लिखवाई लेकिन ननकू पहले से ही पकड़े जाने के डर से गांव से फरार हो चुका था। जबकि संध्या और गरिमा ने साथ मिलकर गांव की अन्य लड़कियों को भी अपने-अपने घरों में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया। कुछ माह में ही संध्या के गांव के अधिकतर घरों में शौचालय बनकर तैयार हो गए।

नोटः जागरुकता के अभाव और सरकारी योजनाओं की विफलता के चलते आज भी हजारों महिलाएं खुले में शौच करने को मजबूर हैं। यह स्थिति शिष्टाचार के खिलाफ तो है ही, इससे महिलाओं पर दुराचार व यौन हमलों को भी बढ़ावा मिलता है।


Thursday, 8 May 2014

प्रेम विवाह की पर्यायवाची न रह जाए ’कोर्ट मैरिज’


सात फेरे लेकर दांपत्य जीवन में प्रवेश करें या ’कबूल’ है बोलकर किसी को अपना जीवनसाथी बनाएं। विवाह वैध तो अब तभी माना जाएगा जब इसका कानूनी तौर से पंजीकरण कराया जाए। अब तक भारत में आमतौर पर शादी के कानूनी पंजीकरण को ’प्रेम विवाह’ का पर्यायवाची ही माना जाता रहा है। इसका अंदाजा मुझे इस बात से हुआ कि मिसेस दीक्षित को पति के साथ विदेश जाना था। पासपोर्ट बनवाने और वीजा के लिए उन्हें नाक से चने चबाने की नौबत आ गई। यहां उन्हें जरूरत पडी खुद को दीक्षित जी की ’लीगल वेडेड वाइफ’ साबित करने के लिए ’मैरिज सर्टिफिकेट’ की जो उनके पास नही था। सहेली से अपना दर्द बयां करते समय वह तपाक से बोलीं कि एै है कोई घर से भागकर कोर्ट मैरिज तो की नहीं थी जो सर्टिफिकेट पास होता। ये बात मुए सरकारी अफसरों को कौन समझाए।
विवाह के कानूनी पंजीकरण या ’मैरिज सर्टिफिकेट’ की उपयोगिता के प्रति जागरूकता की कमी है। यही कारण है कि कोर्ट या तहसील में रजिस्ट्ार आॅफिस में दर्ज होने वाली शादियों की संख्या बेहद कम है। आमजनों को शादी के लीगल सर्टिफिकेट की कीमत का अंदाजा उस समय ही होता है,जब शादीशुदा संबंधों में किसी तरह की दरार पडने पर मामला कोर्ट तक पहंुचता है अथवा विदेश जाने के लिए शादीशुदा जोडों को इसकी जरूरत पडती है। कोर्ट में चल रहे मामले में पति से कानूनी हक पाने के लिए ज्यादातर महिलाओं को खुद को ब्याहता साबित करने में ही पसीने छूट जाते हैं। तमाम फर्जीवाडों और दलाली के चलते आर्य समाज मंदिरों से मिले शादी के प्रमाण और निकाहनामों को कोर्ट संदेह की द्ष्टि से देखता है। ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से हर  धर्म-जाति के लोगों के लिए कानूनी रूप से विवाह पंजीकरण अनिवार्य करने का फैसला काबिले तारीफ है। फैसले पर मुहर लगाने के लिए सरकार इसके लिए विधेयक लाने की तैयारी में है। विधेयक पास होकर लागू हुआ तो इससे गैर कानूनी शादियों और बाल-विवाह पर भी काफी हद तक लगाम लगने की उम्मीद है। कानूनी रूप से शादी के पंजीकरण के लिए पण्डितों और धर्म गुरुओं के योगदान की भी जरूरत है। यह अपने-अपने समुदाय को इसके लिए जागरूक व प्रेरित कर सकते हैं। फिक्र इस बात की है कि जब पंजीकरण सबके लिए ही अनिवार्य होगा तो पंजीकरण कराने वालों की संख्या द्रुत गति से बढेगी।
हमारे सरकारी सिस्टम की बदहाली और इसकी कार्य प्रणाली की कछुआ चाल से कौन वाकिफ नही है। सरकारी सुस्ती के कारण राशन कार्ड, निवास प्रमाण पत्र या पहचानपत्र बनवाने में जितना समय लगता है। बस समझ लीजिए शादी का लीगल सर्टिफिकेट मिलने में भी उतना ही समय लग सकता है। यह स्थिति तब है जब विवाह पंजीकरण कराने वालों की संख्या अकेले अपने शहर में ही हर साल 300 का भी आकंडा पार नहीं कर पाती। ’स्पेशल मैरिज एक्ट-1954 के तहत केवल धारा पांच का फार्म वर-वधू दोनो को अलग अलग भरकर मैरिज कोर्ट में जमा करना होता है,लेकिन केवल फार्म भरकर जमा करनेभर से पंजीकरण नहीं माना जाता। मजिस्ट्ेट की अनुमति के बाद ही सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। औसतन इसमें एक माह से दो माह का समय तो लगता ही है। अब अगर सभी के लिए पंजीकरण अनिवार्य होगा तो पंजीकरण कराने वालों की संख्या सैकडों से लाखों में भी बदल सकती है। सर्टिफिकेट मिलने में महीने के बजाय साल का समय लगेगा। इस स्थिति से बचना है तो ई- गर्वनेस का सपना जो अभी तक कोर्ट-कचेहरियों में पूरी तरह लागू नहीं हो सका है, पूरा करना ही होगा। सरकार की ओर से आॅनलाइन मैरिज रजिस्ट्ेशन की शुरुआत भी करनी होगी। नहीं तो भला कौन सा नव-विवाहित जोडा चाहेगा कि वह नए जीवन की शुरुआत में ही पंजीकरण से लेकर सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए कोर्ट-कचेहरी के चक्कर काटते रहे। नए कानूनों के साथ सरकारी सिस्टम का भी नवीनीकरण जरूरी है। नहीं तो नया विधेयक भी उन्हीं कानूनो की जमात में शामिल हो जाएगा जो पहले से लागू होने के बाद भी ठंडे बस्ते में पडे हैं। हम वहीं खडे रह जाएंगे जहां से चले थे और शादी का कानूनी पंजीकरण या ’कोर्ट मैरिज’ ’प्रेम विवाह’ के पर्यायवाची तक ही सीमित रह जाएगा।

नोट-मेरा यह लेख हिन्दी समाचारपत्र कैनविज टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है।

Sunday, 4 May 2014

हमने सुना है!


हमने सुना है लोकसभा चुनाव में इसबार बड़ी हुड़दंग मची है। चरम की जुबानी माराकाटी चल रही है। नेता चचेरे भाईयों की तरह लड़-झगड़ रहे हैं। कोई किसी को पप्पू बुला रहा है तो कोई किसी को फेंकू। चुनावी अखाड़े में कोई कच्चा खिलाड़ी बताया जा रहा है तो किसी के विकास के माॅडल की तुलना टाॅफी से हो रही है। किसी के दीन-दुखियों की सुध-बुध लेने को ‘गरीबी का टूरिज्म‘ करार दिया जा रहा है तो कोई देश के चैकीदार बनने के इच्छुक अभ्यर्थी को रातों-रात जेल की हवा खिलाने की बातें कर रहा है। 
इस सब के बीच एक मौनी बाबा भी हैं जो कुछ भी हो जाए भले ही सत्ता लुट जाए, राजपाट रहे न रहे पर उनका मौन व्रत तोड़ना नामुमकिन है। हमारे नेतागण अपने प्रतिद्वंदी से रिश्ते-नाते जोड़ने में भी पीछे नहीं हैं। पापा की बहन होने के नाते पापा के पुत्र की वह बुआ बन गई हैं तो विरोेधी खेमे की स्टार प्रचारक को चिंटू का स्त्रीलिंग चिंटी बताने के लिए बेटी बनाने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा। चुनाव प्रचार के दौरान थप्पड़-लप्पड़ भी खूब चल रहे हैं। किसी खास वर्ग को बोरिया बिस्तर बांधकर पाकिस्तान भेजने के सपने भी देखे जा रहे हैं। हालांकि ऐसे भाषण देने वाले अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं और अपनी कंपनी की नई-नई मार्केटिंग पाॅलिसी की धज्जियां उड़ा रहे हैं। पर कुछ भी कहिए आम जनता इस हुड़दंग के खूब मजे लूट रही है। इसके चलते टीवी चैनलों की टीआरपी और अखबरों का सर्कुलेशन भी जरूर बढ़ा है। लोगों से बातचीत के आधार पर ऐसा मेरा मानना है।
जब किसी को कुछ कहते नहीं बनता तो मीडिया को ‘लहर-जहर‘ का जिम्मेदार भी ठहराया जाता है। भई मीडिया तो जैसे बनी ही इसलिए है कि बुरी कहे तो चपाट खाए-खाए, अच्छी कहे तो भी कोसी जाए।
बु़़द्धीजीवी वर्ग इस जुबानी मारकाट वाले हुड़दंग की आलोचना कर रहा है। पर आम आदमी तो बड़े मजे ले रहा है। मजे-मजे में ही इसबार जनता बड़ी जागरूक हो गई है। बेकार की बातें पढ़ने-सुनने के बहाने कुछ काम की बातें पता लगी जा रही हैं। चाय के होटलों पर फालतूगीरी करने वाले चाय पीते-पीते चुनावी प्रक्रिया के बेसिक ज्ञान से रूबरू हुए ले रहे हैं, क्योंकि ‘‘ठेले पर चाय बेचने वाला व्यक्ति चुनावी ज्ञान का प्रोफेसर हो गया है।‘‘ पर कुछ भी कहिए इतना सुनने-देखने के बाद हम तो इस निष्कर्ष पर पहंुचे हैं कि चाहे इसबार के राजनैतिक प्रचार में जिन नए-नए सूक्ति वाक्यों और मुहावरों का प्रयोग हो रहा है, उससे आम पब्लिक आनंद लेते हुए चुनावी महापर्व का इतिहास, भूगोल व गणित सब अपनी आसान भाषा में समझ रही है।
तभी तो देखिए इसबार के चुनाव में नोटिस करने योग्य मतदान प्रतिशत बढ़ा है। महिलाएं भी वोटिंग के मामले में पुरुषों को कांटे की टक्कर देने के पथ पर अग्रसर हो चली हैं। इन्हें भी चुनावी चक्कलस में बड़े मजे आ रहे हैं। लगता है चुनाव आयोग भी मतदान प्रतिशत बढ़ने के संबंध में इस जुबानी मार-काट व चीर-फाड़ का महत्व समझ रहा है। इसीलिए आपत्तिजनक बयानबाजी करने वाले नेताओं के लिए थोड़ा नरम रुख अपनाए हुए है और खुद भी आलोचना का शिकार हो रहा है। भई कुछ भी कहिए आदर्श स्थिति तो यही है कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों या नेताओं को अपनी जुबान पर लगाम लगानी चाहिए पर लगाम ढीली पड़ रही है और इससे देश के चुनावी महापर्व की अच्छी मार्केटिंग हो रही है तो ज्यादा चीख-चिल्लाकर गला खराब करने की क्या जरूरत है। बस देश की आम जनता से अपील है कि इस बार के नहीं बल्किी हर बार के चुनाव में, ‘वोट करते रहिए शान से।‘‘

नोट-मेरी चुनावी टिप्पड़ी को अन्यथा न लें। किसी खास राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा से प्रेरित होकर चुटकी नहीं ली है। आम महिला हंू, इसलिए अपने आम से विचारों को आम जनता के हक में लिखने का मन किया तो लिख दिया। वैसे भी आम का मौसम है। आमों के साथ आम चुनाव के रस का आनंद लीजिए। धन्यवाद!

Saturday, 3 May 2014

कहानी-डोरबेल

शहर, मोहल्ला और गली कोई भी हो औरतों की जिंदगी एक-दूसरे से कुछ खास अलग नहीं होती। कहीं यह ससुराल में दहेज न लेकर आने के लिए पीटी जाती हैं। कहीं अपनी मर्जी से छोटे-छोटे फैसले लेने के लिए तो कभी अच्छा रंग-रूप न होने के कारण भगवान की गलती का खामियाजा भी इन्हें ही पति की उलाहना और प्रताडना झेलकर चुकाना पडता है। तभी तो कई साल पहले जो बेचारी रजिया के साथ दिल्ली में घटा था, उससे मिलती-जुलती ही हालत यहां रश्मि की मालूम होती है। कलाताई पडोस से आ रही चीखों और धमाचैकडी की आवाज पर तकिए से दाहिना कान दबाए हुए सोने की कोशिश करते हुए यही सोच रही थीं। रात का एक बजा था। पडोस की रश्मि को उसका पति पीट रहा था। यह नहीं पता किस बात पर। धीरे-धीरे चीखें कम हुईं तो कलाताई को कुछ चैन पडा,लेकिन नींद नहीं आ रही थी।

कलाताई दिल्ली की रहने वाली थीं। उनका अचार-पापड का वहां फलता-फूलता बिजनेस था। पति शादी के दूसरे साल बाद ही चल बसे थे। शादीशुदा जिंदगी के कुछ कडवे अनुभवों के कारण कलाताई ने दोबारा शादी करने की सोची भी नहीं और आत्मनिर्भर बनना ज्यादा बेहतर समझा। बच्चे थे नहीं सो अपने सपने को साकार करने में उन्हें कोई खास अडचन भी नजर नहीं आई। अपने गहने बेचकर दिल्ली में ही अचार-पापड का बिजनेस  शुरू किया जो कुछ शुरूआती अडचनों के बाद चल निकला। अपने बिजनेस को लखनऊ में विस्तार देने के लिए वह आजकल अपनी बहन रज्जो के घर ठहरी हुई थीं। रज्जो ने ही बताया था कि पडोसिन रश्मि को उसका पति अक्सर मारा-पीटा करता है। जितने दिन रहेंगी उन्हें पडोस के हंगामे सुनने की आदत डालनी होगी। कलाताई ने रज्जो से कहा कि उस बेचारी रश्मि को बचाने के लिए तुम मोहल्ले वाले हस्तक्षेप क्यों नहीं करते। उसकी डोरबेल यानि दरवाजे की घंटी ही बजा दिया करो, जब वह पिट रही हो। बेचारी शायद मार खाने से बच जाए। इस बात पर रज्जो ने कलाताई को अजीब नजरों से देखा और फिर बोली जीजी आप भी न! अपना काम करने आई हो वही करो। क्या फायदा उनके घर का मामला है। उल्टे कुछ हमें ही उल्टी-सीधी सुना दी तो मुझसे तो बर्दाश्त न होगा। यह कहकर रज्जो ने बात टाल दी। लेकिन कलाताई को चैन नहीं पडा। मन ही मन उन्होंने कुछ ठान लिया था।
रज्जो के घर में ठहरे आज उन्हें चैथा दिन ही था। रश्मि की चींखें रुकरुकर करीब आधे घंटे से उनके कानों में पड रहीं थीं,लेकिन अपनी बहन रज्जो की हिदायत पर वह बडी मुश्किल से खुद पर काबू किए हुए थीं। ये चीखें उन्हें दिल्ली में उनकी काॅलोनी की एक नव विवाहिता लडकी रजिया की दर्दनाक कहानी की यादों में खींच ले गई। और कलाताई यादों के समंदर में गोते लगाने लगीं।
रजिया काॅलोनी में हकीम साहब की दूसरी बहू के नाम से जानी जाती थी। उसके पति शादाब का समाज में कोई रूतबा नहीं था। दोहाजू और  रजिया से उम्र में दोगुना था वह। शादाब की पहली पत्नी दूसरे पुरुष के प्रेम में पड जाने के बाद उसके साथ भाग गई थी। शादाब ने चार माह बाद ही दूसरे विवाह के लिए हामी भर दी थी। भला भगोडी पत्नी का शोक भी कोई पुरूष मनाता है। परलोक सिधारी हुई का भी इतने समय तक मना लें तो गनीमत समझो।
रजिया के पिता लल्लन ने उसके लिए दोहाजू लडके को इसलिए हां कर दी थी, क्योंकि रजिया की रंगत तो काली थी ही साथ ही उनकी इतनी हैसियत भी न थी कि दान-दहेज में चार बरतन भी दे सकें। रजिया के पिता गरीबी के कारण ही रजिया सहित अपनी दो अन्य बेटियों को भी स्कूल नहीं भेज सके थे। मदरसे में ही रजिया ने थोडी बहुत दीनी तालीम पाई थी। वह अपनी तीन बहनों में सबसे बडी थी। रजिया की रंगत और परिवार की गरीबी के कारण उसके रिश्ते आते ही थे, किसी न किसी खोट-नुक्स वाले। वह करीब 25 साल की थी। इसलिए बेटी की बढती उम्र की भी चिंता लल्लन को थी। लल्लन ने इसलिए जैसे-तैसे उसके हाथ पीले करके बला टाली।
ससुराल में रजिया की चीखें शादी केेेे 21वें दिन ही काॅलोनी वालों के कान फाडने लगीं थीं। सबको पता था कि शादाब जिस तरह अपनी पहली पत्नी को पीटा करता था, वैसे ही वह रजिया को भी आधी-आधी रात को मारा-पीटा करता है। लेकिन काॅलोनी के लोगों ने गाॅसिप करने के अलावा कभी हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह कहकर मामला टाल दिया जाता कि यह उनका घरेलू मामला है। रजिया की शादी को पांच माह गुजर चुके थे। उसके साथ मार-कुटाई का सिलसिला जारी था।
  वह ईद का दिन था। ईद के दिन मुस्लिम समुदाय में एक दूसरे के घर जाकर गले मिलकर त्योहार की बधाई देने का चलन है। लेकिन उस दिन रजिया का घर बिल्किुल सूना पडा था। पूरा दिन गुजर गया काॅलोनी में रजिया के घर का मेन गेट खुलने की एक बार भी आवाज नहीं सुनाई दी। मुझसे रहा नहीं गया तो शाम करीब पांच बजे ईद मिलन के बहाने रजिया का हाल लेने पहंुच गई।
 मेन गेट का चैनल तो हाथ डालकर खोल लिया फिर साडी ठीक करते हुए मैने अंदर के दरवाजे की डोरबेल बजाई। लेकिन दरवाजा नहीं खुला। सोचा हो सकता है, अंदर के कमरे में टीवी देख रही हो या सो रही हो बेचारी। अकेली ही तो रहती है। उसके ससुर हकीम साहब तो खुद ही बेटे शादाब के रोज-रोज के हंगामें से तंग आकर छोटे बेटे-बहू के घर दिल्ली रहने चले गए। शादाब घर में हो न हो क्या पता। बहरहाल, इसी सोच में मैने दरवाजे की घंटी आठ या दस बार बजाई। इसके बाद बजाती चली गई, दरवाजा नहीं खुला। मैं दरवाजे पर ताला चेक करने लगी। कोई ताला नहीं लगा था। अब तक मेरे दिल की घडकने बढ चुकी थीं। किसी अनजाने खौफ से मैने रजिया, रजिया चीखना शुरू कर दिया। 10 मिनट में ही काॅलोनी के लोग इकट्ठा हो चुके थे। दरवाजा तोडा गया। घर के अंदर रजिया के बेडररूम का नजारा दिल दहला देने वाला था। रजिया की लाश दुपटटे के सहारे पंखे से झूल रही थी। बिस्तर पर लकडी का स्टूल गिरा पडा था।
  कमरे की सेंटर टेबिल पर एक कागज गिलास से दबाकर रखा मिला। उसमें उर्दू में लिखा हुआ था। मैं अपनी जिंदगी खत्म करने की जिम्मेदार हंू। जीने से ज्यादा मौत आसान लगी इसलिए यह कदम उठाया। मुझे शादी से अब तक एक बीवी होने का सुख नहीं मिला। शादाब नामर्द है। मैं तो इसपर भी उसके साथ जिंदगी बिता देती,लेकिन वह सिर्फ जिस्मानी ही नहीं बल्कि दिमागी तौर से भी बीमार है। अपनी नामर्दानगी की खीज वह मुझे हर रात पीट-पीटकर निकालता था। मेरे जिस्म को नोंच-खरोचकर वह राक्षसों की तरह ठहाके लगाता। मैं दर्द से तडपती-चीखती तो उसके चेहरे पर सुकून की लहरें हिलोरे मारतीं। मेरे जिस्म पर पडे उसके दातों और ठोकरों के निशान उसकी हैवानियत का सबूत हैं। अल्लाह गवाह है मैं यह जुल्म सहने के बाद भी जीना चाहती थी। शादाब की कैद से आजाद होना चाहती थी,लेकिन कोई बताए था मेरे लिए कोई ठिकाना जहां मुझे पनाह मिल सकती थी। ऐसे मायके में वापस जा सकती थी जहां कंुवारी बेटी ही बोझ थी। क्या मोहल्ले की उन औरतों से अपना दुख साझा करती, जिनकी निगाहें सिर्फ यह देखती थीं कि मैनें किस रंग की और कितने भारी काम वाली, कीमती साडी पहन रखी है। मैं तो मुस्तफा की पहली बीवी की तरह प्रेमी के साथ भाग भी नहीं सकती थी। खूबसूरत जो नहीं हंू फिर कौन भगाना चाहता मुझे। किसी सवाल का जवाब नहीं मिला। इसलिए जा रही हंू, हमेशा के लिए।
  मेरे पडोसी सलीम भाई ने खत जैसे ही पढकर रखा। वहां पुलिस पहंुच चुकी थी। एक-एक करके सभी काॅलोनी वालों से पूछताछ शुरू हो चुकी थी। मेरे दिमाग में आंधियां चल रही थी। पश्ताचाप की आधियां। इस घर की डोरबेल बजाने में मुझे बहुत देर हो गई। यह सोचकर मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था। काश की यह डोरबेल मैने पहले ही रजिया की चीखें सुनने पर बजाई होती। मुझसे देर हुई तो कोई और ही बजा देता। तब शायद यह नौबत नहीं आती। रजिया का दर्द साझा करके। शादाब की ज्यादती पर उसे रोक-टोककर काॅलोनी के किसी भी व्यक्ति ने अपने ंिजंदा होने का सबूत दिया होता तो रजिया जिंदा होती। लेकिन अब कम से कम मैं तो किसी और रजिया को यंू मरने न दंूगी। मैं करूंगी हस्तक्षेप, डोरबेल बजाकर। कलाताई को अपना यह प्रण याद आया। अपने उस प्रण को याद करते हुए वह करवटें बदल ही रही थीं कि पडोसी रश्मि की दिल दहला देने वाली चीख उनके कानों में फिर पडी। कलाताई झटके से उठीं। अपनी साडी ठीक करते हुए घर के मेनगेट की ओर बढ गईं। कुछ ही देर में कलाताई रश्मि के घर की डोरबेल बजा रही थीं। डोरबेल बजते ही अंदर का हंगामा शांत हो गया,लेकिन वह हंगामा अब शायद घर के बाहर होना तय था।
रश्मि के पति संुदर ने बडे तैश में दरवाजा खोला। पूछा क्या चाहिए। कलाताई बोलीं शांति चाहिए। झगडा और मारपीट यहां नहीं चलेगी। संुदर हतप्रभ था। बोला देखिए ये मेरे घर का मामला है। और आप तो मेरे मोहल्ले की भी नहीं हैं। हमारे मामले में न ही बोलें तो अच्छा है। कलाताई ने कहा अब यह तुम्हारे घर का मामला नहीं है। पूरे मोहल्ले की नींद उडा रखी है। उसे जानवरों की तरह पीट रहे हो। यह जुर्म है। मैं अभी पुलिस को बुलाती हंू। पत्नी पर हिंसा के अपराध में जेल की हवा खाओगे तब आएगी तुम्हारी अकल ठिकाने। इतने में रश्मि दौडकर कलाताई के गले लग गई। उसके चेहरे और बाहों पर कुछ पुराने नील और कुछ नई चोटों के निशान थे। कलाताई ने रश्मि से पूछा क्यों मार रहा था यह तुम्हें। रश्मि धीरे से बोली ’दाल में नमक’ ज्यादा हो गया था। कलाताई ने संुदर की तरफ देखा तो अब तक उसकी तनी हुई गरदन थोडी झुक चुकी थी। अब तक कलाताई की बहन रज्जो, बहनोई सुशील और मोहल्ले के अन्य लोग भी रश्मि के घर के दरवाजे पर इकट्ठे हो चुके थे। कलाताई ने बडे विश्वास के साथ कहा चल रश्मि मैं तेरे जख्मों पर दवा लगा देती हंू। मैं अभी दिल्ली वापस नहीं जा रही। तेरा पति अगर फिर ऐसी हरकत करेगा तो मैं फिर तेरे घर की डोरबेल बजाऊंगी। मैं न भी रही तो तेरे मोहल्ले वाले तेरा साथ देंगे। यह कहते हुए कलाताई ने मोहल्ले के गणमान्य व्यक्तियों की तरपफ देखा तो जैसे आंखों ही आंखों में सबने कलाताई को रश्मि के लिए वादा दे दिया।

नोटः जागरुकता के अभाव में आज भी हजारों महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं। इससे महिलाओं का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। हालांकि देश में ‘घरेलू हिंसा से संरक्षरण कानून-2005‘ लागू है फिर भी घरेलू हिंसा से प्रताडि़त कई महिलाएं आत्महत्या तक कर लेती हैं। कहानी के माध्यम से समस्या बताने और इसका समाधान सुझाने के पीछे ब्लाॅगर यानी कि मेरा एकमात्र उद्देश्य है भारतीय समाज में जागरुकता लाना। मेरी किसी भी कहानी व लेख को अन्यथा न लिया जाए। मेरी यह कहानी हिन्दी मासिक पत्रिका ‘दस्तक टाइम्स‘ में प्रकाशित हो चुकी है। धन्यवाद!