Thursday, 14 August 2014

अंग्रेजी शासन से मुक्ति पर आज़ाद कब कहलाएंगे...!



आज़ादी के 68 साल बाद भी आप हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे को याद करके क्यों दुखी होते हैं? या डिवाईड एण्ड रूलयानी बांटों और राज करो की नीति के लिए अंग्रेजों की निंदा क्यों करते हैं। जबकि आप खुद आज धर्म, जात, क्षेत्र, भाषा, राज्य, आर्थिक और यहां तक कि बौद्धिक आधार पर बंटवारे के लिए तैयार रहते हैं। फिर इसी बंटी हुई जमात में से अपना नेता चुनते हैं। ज्यादा दूर न जाईए तो दो महीने पहले सम्पन्न हुए आम चुनाव तक चलते हैं। धर्म के नाम पर बीजेपी को जिताने के लिए एक तरफ हिंदू एकजुट होते दिखाई दिए तो कई इलाकों में मुसलमान संगठित हुए बीजेपी को शिकस्त देने के लिए। इन्होंने उनके लाल टीके से खुन्नस निकाली तो उन्होंने इनकी सफेद टोपी व दाढ़ी से़। इधर आपके समर्थन में एलीट वर्ग खड़ा नज़र नहीं आया। इन्हें यह डर कि जुड़ गया तो इनकी खासियत जाती रहेगी। इसी तरह बसपा दलितों और पिछड़ों की पार्टी मानी जाती है, तो यहां तो और भी दिक्कत है। एकआध बार नाम लिया,तज़किरा किया बसपा सुप्रीमो मायावतीका अपनी पढ़ी-लिखी सर्वण हम मज़हब बहनों के बीच। जवाब में सुनने को मिला कि वह तो मेहतरों-चमारों की नेता हैं, इनसे तो बेहतर है सपा को चुनें, आखिर मुसलमानों के हक की बात तो करती है। दिल को ठेस लगी यह सोंचकर कि सड़क किनारे चाट के ठेले पर गोलगप्पे खाने से पहले तो तुम चाट वाले की जात नहीं पूछतीं फिर मताधिकार के प्रयोग के लिए कास्ट कांशिएसक्यों?
ज़रा यूपी के हालिया हालात पर नज़र डालिए। एक लड़का किसी लड़की को छेड़ता है तो इसे धर्म व जात की इज्जत का सवाल बना लिया जाता है और प्रदेश में दंगे भड़क जाते हैं। यहां मुसलमान मंदिर में लगा लाउडस्पीकर उतारने को आतुर हैंै क्योंकि उसे डर है कि भजन सुनने से उसका धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। क्या इसी दिन के लिए हमने अंग्रेजों से आज़ादी हासिल की थी? शहीदों ने अपना खून बहाया था कि भाई-भाई का गला काटे। यूपी-बिहार के लोग महाराष्ट जाते हैं रोज़ी-रोटी की तलाश में। अपनी प्रतिभा के बलबूते नौकरी हासिल करना चाहते हैं पर एक नहीं कई बार ये हुआ कि क्षेत्रवाद से प्रेरित होकर टैलेण्ट को भईयाकहकर धक्का दे दिया गया। अंग्रेजी जानने वाला आदमी हिंदी जानने वाले के रास्ते का कांटा बना बैठा है। कैसी विडंबना है? अवसर के लिए भाषा के खिलाफ जंग छेड़नी पड़ रही है। ये अंग्रेजी के विद्वान ये क्यों भूल जाते हैं कि हमारा देश सोने की चिडि़यातब कहलाता था जब न यहां अंग्रेज थे न अंग्रेजियत। किसी भाषा का जानकार होना अच्छा है। पर एक भाषा को दूसरी भाषा की सौतेली बहन बनाकर खड़ा कर देना गलत है। महानगर के कई लोग गांव कस्बे के लोगों की सोच को छोटा बताकर उनके मूल्यों और आदर्शों की खिल्ली उड़ाते हैं। यहां तक कि एक ही शहर के निवासी नए और पुराने शहर के आधार पर खुद को बंटा हुआ दिखाना पसंद करते हैं। अक्लमंदी का सर्टिफिकेट पाए हुए कुछ माननीय अपने से छोटे संघर्षशील व्यक्ति से दूरी बनाकर चलते हैं। वे अपनी जमात वालों के शिटपर भी वाह-वाह करते दिखाई पड़ते हैं लेकिन संघर्षशील व्यक्ति के टैलेण्ट को गले लगाने से हिचकिचाते हैं। ये भी भूल जाते हैं आज वे जिस जगह हैं वहां तक इसी रास्ते से होकर पहंुचे हैं। कहने का मतलब ये है कि यदि आप लोग इस क़दर बंटे हुए हैं। और बांटने-बंटने की पालिसी पर ही चलते रहना है तो फिर देश या समाज के नुकसान पर मगरमच्छ के आंसू बहाना बंद कीजिए। किसी भी तरह के बंटवारे, भेदभाव, अन्याय और गुलामी वाली व्यवस्था पर झूठा अफसोस जताने का तब तक कोई फायदा नहीं जब तक कि आप खुद भी किसी न किसी रूप में इसी व्यवस्था का हिस्सा हैं। अंग्रेजों के बाद अगर देशवासियों को आपस में ही अपने अधिकारों या समान अवसरों के लिए अलग-अलग धर्म, जात, क्षेत्र, भाषा और विचारों के कारण संघर्ष करना पड़े तो फिर हम आज़ाद कैसे और किन मायनों में हुए,गौर करने की जरूरत है।

Sunday, 3 August 2014

दिस इज नाट इंटरटेंमेंट आमिर!

 आप ये सोंचकर गर्व से फूलकर कुप्पा हो सकते हैं कि देश के लाखों-करोड़ों नौजवान आपको अपना ‘रोल माडल‘ मानते हैं। इस नाते साल दो साल में करोड़ों के बजट वाली एक ऐसी धांसू फिल्म सिनेमा के पर्दे पर उतारनी जरूरी है, जिससे न सिर्फ आप खुद जबरदस्त मुनाफा कमाएं साथ ही पब्लिक भी देखकर यह कह सके कि ‘चलो पैसा वसूल हुआ‘। बालीवुड के नामचीन सितारों और आज की आम नौजवान पीढ़ी के बीच रिश्ता केवल इतना ही होता तो बात कुछ और थी। पर दिक्कत ये है कि बात यहीं खत्म नहीं होती। ये आपके जैसे बोलना चाहते हैं। चलना चाहते हैं। कपड़े पहनना चाहते हैं। कुल मिलाकर आपके जैसा ही दिखना चाहते हैं। फिर इन भोलेभाले नौजवानों से ये उम्मीद कैसे की जा सकती है कि किसी नए प्रयोग पर ये ‘वाउ! वाट ए न्यू एक्सपेरीमेंट‘ या ‘वाट ए पीस आफ आर्ट‘ कहकर आगे बढ़ जाएंगे! जी बिल्कुल ठीक समझे आप। मैं यहां बालीवुड के सुपर स्टार के साथ-साथ एक सोशल थिंकर की इमेज बनाने वाले ‘आमिर खान‘ से मुखातिब हंू।
मानना पड़ेगा कि अपनी आगामी फिल्म ‘पीके‘ में आमिर ने बड़ा ही चैंकाने वाला दृष्य फिल्माया है जो इन दिनों चर्चा में है। चैंकाने वाला इसलिए नहीं कि इसमें एक नंग-धड़ंग, शर्म की जगह पर बड़ा सा टेपरिकार्डर लगाए बालीवुड का एक नायक खड़ा हैं। बल्कि इसलिए कि इस अवस्था में ‘दि आमिर खान‘ खड़े हैं। शायद फिल्म को प्रोमोट करने और रिकार्ड मुनाफा कमाने के लिए यही हथकंडा सबसे ज्यादा काम आने वाला है। लेकिन मेरा मानना है कि आमिर खान और उन जैसे अन्य सितारों को जो आम नौजवानों के रोल माडल हैं और एक सामाजिक चिंतक के रूप में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं। अपना मुनाफा बढ़ाने के लिए खुद की सोशल इमेज और नैतिकता के साथ समझौता करना शोभा नहीं देता। फिल्म ‘गजनी‘ में जब आमिर खान ने सिर पर लम्बी लकीर खिंचवाईं थी तो मुझे याद है कि मोहल्ले में, रास्ता चलते हुए, बाजार में चार-छह नौजवान वैसे ही स्टाइल में सिर पर लकीर बनवाए हुए दिख जाते थे। उन्हें गजनी की कहानी से कोई लेना-देना नहीं था कि उसमें कैसे आमिर के सिर पर चोट लगने की वजह से वह लकीर पड़ जाती है। उन्होंने तो इसे फैशन ही माना। अब जब आमिर नंगधड़ंग खड़े हैं तो...........!!! मैं ये नहीं कहती कि सभी नंगे हो जाएंगे। शायद इतनी समझ तो है हमारे देश के किशोरों व नौजवानों में, लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा अगर उनमें नंगेपन को लेकर शर्म खत्म हो जाए। साथ ही इस तरह के पोस्टर चाहे वे नायिकाओं के हों या नायकों के यौन उत्तेजना जगाने वाली सामग्री में जरूर गिने जा सकते हैं। इससे यौन हिंसा को बढ़ावा मिल सकता है। आज जब देश में चारों तरफ यौन हिंसा की घटनाएं आम होती जा रही हैं। हमें अपनी नौजवान पीढ़ी को सम्भालने की जरूरत है। यह जिम्मेदारी भला समाज में रोल माडल की भूमिका अदा कर रहे लोगों से बेहतर कौन उठा सकता है। हालांकि एक जागरूक व्यक्ति द्वारा आमिर के इस पोस्टर के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की जा चुकी है। मेरा मानना है कि समाज के अन्य स्तंभ से भी इसके खिलाफ स्वर मुखर होने चाहिए। केवल आमिर के पोस्टर ही नहीं बल्कि इस तरह की अन्य दृष्य सामग्रियों पर रोक के लिए सख्त आदेश-निर्देश जारी होने चाहिए। उनके खिलाफ भी जो खुद मुनाफा कमाने के लिए इस तरह के विज्ञापन छापते या प्रसारित-प्रचारित करते हैं या इसकी अनुमति देते हैं। अंत में बस इतना कहना चाहते हैं कि हम किसी की प्रतिभा के खिलाफ नहीं है। ‘कयामत से कयामत तक‘ के रोमांटिक आमिर, ‘दिल‘ के आशिक आमिर, ‘लगान‘ के किसान आमिर, ‘मंगल पाण्डेय‘ के क्रातिकारी आमिर, ‘थ्री ईडिएट‘ के इनोवेटिव-क्रिएटिव आमिर और ‘सत्यमेव-जयते‘ के समाज-सुधारक आमिर बेशक काबिल-ए-तारीफ हैं।

Friday, 25 July 2014

एक रोशन सितारा मायका और ससुराल

सामान्य ज्ञान की पुस्तकों में नई जानकारी शामिल होने वाली है। बच्चों इसे अपने ज्ञानकोश में जल्दी-जल्दी शामिल कर लो, क्योंकि कई प्रतियोगिताओं में पूछा जाने वाला है-क्या आप जानते हैं-‘देश के नए 29वें राज्य ‘तेलंगाना‘ का ‘ब्रांड एम्बेसडर‘ कौन है? अरे लेकिन रूको.....रूको...... बताउं कि नहीं कि उत्तर क्या है? उंह बता ही देती हंू......तुम्हारा क्या है? तुम तो मासूम हो! लिंगभेद,छल-कपट, जात-पात और खासतौर से राजनीति, इन शब्दों से कोसों दूर! ये थोड़ी समझते हो कि अपने देश में बेटी को ‘पराया धन‘ माना जाता है। मतलब कि ‘बेटी घर बाबुल के किसी और की अमानत है‘। अब अगर शादी के पहले ही बेटी गैर की अमानत तो फिर शादी के बाद तथाकथित असली मालिक के पास पहंुच जाने पर मायके वाले उसे कैसे अपना मान सकते हैं? भले ही बेटी कितनी ही हुनरमंद क्यों न हो। तो क्या हुआ कि उसने पूरे विश्व में अपने मायके रूपी देश का सिर गर्व से ऊचा किया हो।  दरअसल अपने यहां ‘बेटी डोली में ससुराल जाती है और अर्थी में वापस आती है‘ वाली ‘माईथौलजी‘ पर सिर फोड़ने वालों की कमी नहीं है। इन्हें तो यह मलाल होगा कि शत्रुदेश में निकाह होने के बाद खुदा न करे, उसकी अर्थी मायके क्यों नहीं लौटी। ताकि ये दो पड़ोसियों के बी नफरत की आग को और भड़का सकें। इन्हें ये कैसे सुझाई देगा कि मंुबई में उसका जन्म हुआ था और वह हैदराबाद की बेटी है। छह साल की उम्र से उसने टेनिस खेलना शुरू कर दिया। कई अंतरराष्टीय टेनिस मैचों में हिस्सा लेकर देश की आम लड़कियों के लिए रोल माॅडल बनी। 2003 में वाइल्ड कार्ड एंटरी से विंबलंडल में डबल्स के दौरान फतह हासिल करके सबको चैंकाया। 2004 में बेहतरीन प्रदर्शन के लिए ‘अर्जुन पुरस्कार‘ से सम्मानित की गई। 2009 में भारत की तरफ से ‘ग्रैंड स्लैम‘ जीतने वाली पहली महिला खिलाड़ी बनी। मुस्लिम परिवार को बिलांग करते हुए, जहां लड़कियों को बुरका पहनाकर उनका दायरा सीमित कर दिया जाता है खुद को स्थापित किया।

Monday, 21 July 2014

भावनाओं के मीटर को मैनेज करो सखि

एक ओर ओपन एयर रेस्तरां में दोस्तों के साथ बैठकर पिज्जा-बर्गर खा रही हो। मल्टीप्लेक्स में 'पहले दिन का पहला शो' देख रही हो। स्कूटर-कार से सड़कों पर फर्राटे भर रही हो। स्कूल-कालेज में मिनी स्कर्ट, जींस पहनकर घूम रही हो। बार्डर पर दुश्मनों के सीने पर गोलियां दाग रही हो। हवाई जहाज से सरहदें फलांग रही हो। कबड्डी खेल रही हो, मुक्केबाजी कर रही हो। पहाड़ चढ़ रही हो। चांद पर जा रही हो। अंग्रेजी में गिटपिट कर रही हो। लैपटाप से वीडियो चैट कर रही हो। स्मार्टफोन से फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप अकाउंट हैंडिल कर रही हो.........! और दूसरी ओर........! बहलाई-फुसलाई जा रही हो, घुमाई-टहलाई जा रही हो। बहकाई-भगाई जा रही हो। रुलाई-सताई जा रही हो। डराई-धमकाई भी जा रही हो!!! कभी सोचा है क्यों? जहां तक मुझे लगता है तुमने अपने विकास के हर पहलू पर गौर किया है सिवाय भावनात्मक पहलू के। ठीक है कुदरत ने स्त्रियों के हैण्डबैग में भावनाएं-संवेदनाएं मुट्ठी भर-भरकर डाली हैं। पर क्या ये जरूरी है कि आगा-पीछा सोचे-समझे बिना इन्हें सोशल साइट के स्टेटस की तरह हर किसी ऐरे-गैरे को शेयर करती चलो.....

Sunday, 20 July 2014

वह 80 मीटर तक फैला खून देखकर कहती है......!

वह सुन्न बैठी है अभी उसी सरकारी स्कूल की बाहरी दीवार पर। एकटक देख रही है अपने 80 मीटर दूर तक फैले गाढ़े-लाल खून को। वह देख रही है अपनी नग्न पड़ी लाश को। उस परिसर और उस हैण्डपम्प को भी, जहां उसके साथ हुई दरिंदगी के निशान जगह-जगह चस्पा हैं। वह सुन रही है उन चीथड़ों की फड़फड़ाहट जो तड़प रहे हैं उसकी उस डरावनी रात की बेबसी पर। वह सिसकते हुए हाथ जोड़कर कह रही है तमाशबीनों से.......माफ करो! नहीं लेना मुझे जन्म दोबारा तुम्हारी इस धरती पर। क्या करूंगी आकर ऐसी धरती पर जहां बेटियों की बोटी-बोटी नोंचकर इंसान कहलाने वाले वहशी दरिंदे अपनी वासना का पेट भरते हैं। ये क्या बेटियों की सुरक्षा वाले कानून के ढकोचले फैला रखे हैं। तुम पर भरोसा किया तो जरूर फिर उठा ली जाउंगी किसी चलती-फिरती सडक से और मुझे निवस्त्र करके मर्दानगी के सबूत दिए जाएंगे। बालों से पकड़कर घसीटा जाएगा। डंडों-लाठियों से पीटा जाएगा। बहाया जाएगा मेरे जिस्म में दौड़ रहे खून का कतरा-कतरा और मेरी चित्कार न पहंुच सकेगी किसी के कानों तक। न समय रहते तुम तक न गंूगी-बहरी कानून व्यवस्था के कानों तक! अब तुम ही बताओ कि जन्म ही क्यों लंू मैं इस धरती पर अपनी मौत का ऐसा वीभत्स तमाशा देखने को? इससे तो मैं उस गंदे नाले में अच्छी जहां जन्म से पहले मेरे भ्रूण को काले थैले में लपेटकर फेंक दिया जाता है।
मैं जब सयानी हो रही थी, भ्रम हो चला था कि मेरे एक नहीं कई रक्षक हैं। मेरे जैविक माता-पिता के अलावा मेरे देश-प्रदेश और शहर की कानून व्यवस्था। यही सोंचकर तो मैंने घर से बाहर स्कूल-काॅलेज, बाजार, दफतर के लिए कदम निकाले थे। मुझे क्या पता था कि इस धरती पर भेडि़ये खुले घूम रहे हैं और इनके पैरों में ज़जीरे डालने वाली सत्ता भोग-विलास में मस्त है। पर अब ये सब सोचने से भी क्या फायदा क्योंकि लचर कानून-व्यवस्था और अपराधियों की बर्बरता की बलि चढ़ चुकी है मेरी देह। इसलिए अब हाथ जोड़कर फरियाद ही कर सकती हंू, अपनी उन सभी बहनों की सुरक्षा के लिए जो इस ‘भारत मां‘ कहलाने वाली अंधेरी और जंगली धरती पर पहले से ही जन्म ले चुकी हैं या लेने वाली हैं.......!
पहली फरियाद उनसे जो बड़े ही सभ्य-शांत तरीके से मोमबत्तियां जलाकर मेरी शांति की दुआ मांगने का स्वांग रचाने वाले हैं। मैं कहना चाहती हंू उनसे कि देखो सभ्यता और शांति का ढ़ोंग उनके लिए करना जो शांति से मरी हैं। मैं तो इतनी वीभत्स मौत मरी हंू कि मौत भी मुझे साथ ले जाते हुए चीखें मार-मारकर रो रही थी, बस तुम ही लोग सुन नहीं सके। मुझसे ज़रा भी हमदर्दी है तो वादा करो कि सड़कों पर उतरोगे मेरे लिए। वादा करो कि सत्ता के गलियारों में घुसकर, जिम्मेदारों की छाती पर चढ़कर,घंूसे मार-मारकर सोई हुई कानून व्यवस्था को जगाओगे। मिलेगी कुछ शांति मुझे तब, जब कानून की बेल्ट अपराधियों की खाल उधेड़ेगी। 
दूसरी फरियाद उन सत्ताधारियों से जो मेरे बलात्कार पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने वाले हैं। मैं हाथ जोड़ती हंू उनके आगे कि इस बार तरस खाकर ही सही, कुछ ऐसा जरूर करना जिससे इंसानियत फिर कभी शर्मसार न हो। वरना सच मानों आम बेटियों की चिता पर तुम इसी तरह बंसी बजाते रहे तो वह दिन दूर नहीं जब दरिंदों के हाथ तुम्हारी बेटियों के गरीबां तक भी पहंुचेंगे।
तीसरी फरियाद है उन माओं से जो बड़े नाज और नखरों से बेटों को पालती-पोसती तो हैं लेकिन उन्हें ये नहीं सिखातीं कि खुद उन्हें दुनियां में लाने वाली इस हाड़-मांस की स्त्री को अपनी मर्जी से जीने का अधिकार है। यकीन मानों कि तुम यंू ही अपनी कोख से बेटे पैदा करके उन्हें जंगली झाड़ की तरह पलने-बढ़ने दोगी तो एक दिन ये तुम्हारी देह नोंचने से भी बाज नहीं आएंगे। मिलेगी मुझे मुक्ति अब तभी, जब  किसी पुरुष का वजूद किसी स्त्री के पतन और विनाश का कारण नहीं बनेगा। दे सकते हो मुझे वादा......! अगर हां तो मैं सोचंूगी फिर से तुम्हारी गोद में किलकारियां भरने को, सोचंूगी आंगन में खेलने को, यानी फिर से जन्म लेने को अन्यथा अब बंद कर देना ये गीत गुनगुनाना भी कि......ओ री चिरैया,नन्हीं सी चिडि़या.....अंगना में फिर आ जा रे................!!! 

Saturday, 14 June 2014

आरक्षण दिलाएगा 'इज्जत से जीने' की गारंटी..!

संसद के संयुक्त सत्र में राष्टपति का महिलाओं को संसदीय एवं प्रशासनिक पदों पर 33 फीसदी आरक्षण देकर आगे लाने का वादा आधी आबादी को बेहतर कल की उम्मीद बंधाने वाला है। उम्मीद इस बात की कि देश में सर्वोच्च पदों पर महिलाओं का ज्यादा से ज्यादा वर्चस्व होगा तो इनके जरिए आधाी आबादी की आवाज असरदार तरीके से सत्ता पर विराजमान नीति-निर्णायकों के कानों तक पहंुचेगी। इसकी उम्मीद कि मां की कोख में बेटियों को जीवित रहने और जन्म लेने की गारण्टी मिलेगी। गरीब और दबे-कुचले परिवार में जन्म लेने के बावजूद पोषणयुक्त भोजन मिलेगा। वे आगे बढ़ेंगी, पढेंगी। घर से बाहर निकलने पर सुरक्षित घर वापस लौट सकेंगी। योग्यतानुसार नौकरियां पाएंगी। ससुराल में दहेज न ले जाने पर भी सुखी वैवाहिक जीवन जी सकेंगी। कुल मिलाकर उम्मीद इस बात की कि प्रधानमंत्री ‘नरेंद्र दामोदर दास मोदी‘ की ओर से दिखाए गए अच्छे दिनों का सपना साकार हो सकेगा। हालांकि सैकड़ों उम्मीदों के पूरा होने की राह में जो बेशुमार रोड़े हैं उनको कैसे उखाड़ फेंका जाएगा यह सवाल बड़ी मजबूती से सिर उठाए खड़ा है।
देश में महिलाओं की सामाजिक-आर्थिक स्थिति सुधारने की दिशा में संघर्ष और प्रयास तो आजादी से पहले ही शुरू हो चुके थे। इस दिशा में कई चुनौतियों पर विजय भी हासिल हुई है। लेकिन आजादी के 66 सालों के बाद भी जारी इस सफर की रफतार बहुत धीमी है। महिलाओं के हक में सैकड़ों कानून और योजनाएं लागू किए जाने के बाद भी आधी आबादी की दशा शोचनीय है। ‘कन्या भ्रूण हत्या‘ के खिलाफ सख्त कानून लागू होने के बाद भी देश में प्रत्येक वर्ष सात लाख बेटियों मां के गर्भ में ही मारी जा रही हैं। इससे स्त्री-पुरुष लिंगानुपात में असमानता है। प्रति एक हजार लड़कों के अनुपात में 940 लड़कियां हैं जिससे कई इलाकों में तो शादी के लिए लड़कियां ही नहीं मिल रही हैं। ‘नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो‘ के मुताबिक प्रतिवर्ष 20 हजार से ज्यादा महिलाओं के साथ बलात्कार हो रहे हैं। आठ हजार से ज्यादा दहेज हत्याएं हो रही हैं। पति और रिश्तेदारों द्वारा हिंसा व प्रताड़ना की शिकार महिलाओं का ग्राफ एक लाख का आंकड़ा पार कर चुका है। ‘यूनिसेफ‘ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की 50 फीसदी किशोरियां एनिमिक हैं। यानि उनके जिस्म में खून की कमी है। 40 फीसदी से ज्यादा लड़कियां 18 साल की होने से पहले ही ब्याह दी जाती हैं और 22 फीसदी मां बन जाती हैं।
यह स्थिति तब है जब वर्तमान समय में लोक सभा में महिलाओं का फीसद 11 तो राज्य सभा में 10.6 है। 188 देशों के बीच राजनीति में महिलाओं की भागीदारी के संदर्भ में भारत का स्थान 108वां है। हालांकि मोदी सरकार देश की कमान सम्भालने के बाद से ही इस स्थिति को और सुधारने के प्रयास करती दिखाई दे रही है। प्रधानमंत्री ने जिस तरह अपने मंत्रिमंडल में करीब 25 फीसदी महिलाओं को जगह दी। विदेश मंत्री जैसे महत्वपूर्ण पद के लिए ‘सुषमा स्वराज‘ और ‘लोकसभा स्पीकर‘ के लिए सुमित्रा महाजन के नाम पर मोहर लगाई, इससे ‘महिला सशक्तिकरण‘ को लेकर उनकी नीयत साफ-सुथरी जान पड़ती है। संसद में महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण की घोषणा होने के बाद अब लोकसभा में महिला आरक्षण बिल पास होने और इसपर राष्टपति की मुहर लगने की देरी है। जबकि राज्यसभा में यह बिल पहले ही पास हो चुका है। कदम सराहनीय है लेकिन 33 फीसदी आरक्षण मिलने के बाद आरक्षित सीटों को भरने के लिए राजनैतिक पार्टियों को महिलाओं के लिए दिल बड़ा करने की जरूरत पड़ेगी। आज भी चुनाव में पर्याप्त संख्या में महिलाओं को टिकट नहीं दिए जा रहे। जबकि कई राजनैतिक पार्टियों में ‘महिला विंग‘ तक नहीं हैं। दूसरी ओर सत्ताधारी महिलाओं को भी अपनी जिम्मेदारी की गंभीरता को समझना होगा। सकारात्मक नतीजे भी तभी प्राप्त हो सकेंगे जब सत्ता में भागीदारी रखने वाली महिलाएं स्वंय पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित हुए बिना अपने फर्ज को अंजाम दें। क्षेत्रीय एवं दलगत राजनीति से उपर उठकर महिलाओं के खिलाफ होने वाले अन्याय के खिलाफ एकजुट होकर आवाज बुलंद करें, फैसले लें। भारतीय समाज में उपरी और दिखावटी नहीं बल्कि भीतरी बदलाव लाने की कोशिशें की जाएं। सत्ता को पुरखों की विरासत के रूप में सौंपने का चलन बंद हो। केवल ‘रायल ब्लड‘ को ही तरजीह न दी जाए बल्कि समाज के दबे-कुचले और गरीब तबकों की महिलाओं का भी संसदीय एवं प्रशासनिक पदों पर स्वागत किया जाए।
कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाशित लेख
फोटोः गूगल से साभार

Wednesday, 11 June 2014

सावधान! अकाल डूब मरते हैं "खतरों के खिलाड़ी"

सुनहरे कल के न जाने कितने ख्वाब देख डाले होंगें, उन आंखों ने जिन्होंने अभी-अभी तो दुनिया को देखना-समझना, परखना, जांचना शुरू किया था। अभी तो बस शुरू ही हुआ था सफर हौसलों की उंगली थामकर खुद को साबित करने का। सफर माता-पिता या परिवार की हसरतों को परवान चढ़ाने का। अभी तो बढ़ाए थे मंजिल की ओर चंद कदम इस उम्मीद के साथ कि जीत लेना है सारे जहां को अपने जोश और उमंग से। अभी तो लहराना था उन्हें नीले आकाश में अपनी जीत का परचम लेकिन अफसोस.....!उनकी आंखें मुंद गईं वक्त से पहले ही और इन आखों के मंुदने के साथ ही मंुद गए वे सभी ख्वाब, जो उनसे वाबस्ता थे बस चंद रोज पहले तक ही....!!! ‘ब्यास नदी‘ में 24 जवां जिंदगियों के डूबने के साथ ही डूब गईं ये सारी उम्मीदें और ख्वाब।
उत्तरांचल का ताजा ‘लार्जी डैम हादसा‘ यंू तो देश में होने वाले उन तमाम हादसों की गिनती में इजाफा करता है जो प्रशासन की लापरवाही के कारण होते हैं,लेकिन जब सवाल आज की पढ़ी-लिखी, जागरूक युवा पीढ़ी का हो तो गौर-ओ-फिक्र कुछ गहरी होनी चाहिए कि आखिर क्यों ये युवा जोश में होश गवां बैठने की गलती कर गए या इन जैसे कई अन्य युवा भी अक्सर कर जाया करते हैं? क्या इसके लिए युवाओं को परोसे गए बेलगाम और जिंदगी जैसी बेशकीमती चीज से खिलवाड़ करना सिखाने वाले मनोरंजक कार्यक्रमों और विज्ञापनों या फिल्मों को भी दोष नहीं दिया जाना चाहिए। आपने भी इस तरह के कार्यक्रम घर पर चाय की चुस्कियां लेते हुए कभी न कभी तो जरूर देखे होंगे। एक शीतल पेय के विज्ञापन का उदाहरण देती हंू-पंच लाइन है-‘डर के आगे जीत है‘। इस विज्ञापन में युवा उन सीमाओं को पार करते नजर आते हैं जहां पहंुचकर इंसान की रूह अक्सर थर्रा जाया करती है। सधे-सधाए लोगों के लिए तो ठीक है,लेकिन इस तरह के विज्ञापनों का अनुसरण करना साधारण लोगों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। ऐसे विज्ञापनों की नकल करने से घर के भीतर तो हम बच्चों को रोक देते हैं,लेकिन बाहर हमारे युवा बच्चे ‘एडवेंचर‘ के चक्कर में कब अपनी जान से खिलवाड़ कर बैठें इसका इल्म हमें नहीं हो पाता। हाल ही में रणबीर कपूर और दीपिका पादुकोण की फिल्म ‘जवानी दीवानी‘, कैटरीना कैफ की मल्टी स्टारर फिल्म ‘जिंदगी न मिलेगी दोबारा‘ भी युवाओं को जान का जोखिम लेने की सीख देने वाली हैं। अभिनेता अक्षय कुमार व निर्देशक रोहित शेट्टी की ओर से होस्ट किए जाने वाला रियलिटी शो ‘खतरों के खिलाड़ी‘ भी इसी कड़ी में शामिल है। शो के ताजा सीजन के एपिसोड की शुरुआत में ही रोहित शेट्टी यह दर्शाते कहते दिखाई देते हैं कि ‘हम उन सीमाओं के पार जाकर खतरों से खेलेंगे जहां अक्सर चेतावनी देने वाले बोर्ड लगे होते हैं‘। इस तरह के प्रचार और मनोरंजन पर रोक लगनी चाहिए।
क्या हुआ हादसाः
आठ जून को हैदराबाद के एक ‘इंजीनियरिंग कालेज‘ के छात्र कालेज की ओर से टूर पर निकले थे। हिमाचल प्रदेश के मंडी इलाके में लार्जी डैम के पास नदी के बीचोबींच उतरकर उनमें से कुछ युवा मौज-मस्ती करने लगे, वे फोटो खींच रहे थे, वीडियो बना रहे थे कि अचानक लार्जी डैम से पानी छोड़ दिया गया। इससे नदी का जल स्तर काफी बढ़ गया और तेज बहाव में करीब 24 युवा बह गए। सर्च आपरेशन में अब तक आठ शव बरामद.

Tuesday, 10 June 2014

विकास की स्पीड पर भारी बेटियों की चीखें!

दो बहनों से सामूहिक बलात्कार के बाद पेड़ से लटकाया। सामूहिक बलात्कार के बाद लड़की को तेजाब पिलाया। युवती से सामूहिक बलात्कार के बाद जलाया। प्रेमी युगल पेड़ से लटकाकर फांसी दी। छह साल की बच्ची से रेप! इन दिनों यूपी की यह दिल दहला देने वाली तस्वीर उभरकर सामने आई है। यहां बलात्कार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं। लड़कियां घर से कदम निकालने के नाम पर सहम रही हैं। जाहिर है इस तरह की खबरें सुनकर तो सभ्य समाज के इंसानी दिल दहल ही जाने चाहिए। रोंगटे खड़े हो जाने चाहिए। दिन का सुकून और रातों की नींद उड़ जानी चाहिए पर अफसोस महिलाओं के साथ बर्बरता पर कानून व्यवस्था के जिम्मेदारों की सेहत पर कोई असर होता नहीं दिखाई दे रहा। प्रदेश की बेटियों के साथ क्रूर से क्रूरतम अपराध घटित हो रहे हैं। सत्ताधारी या रसूख-दबदबे वाले लोग त्वरित और कड़ी कार्रवाई के बजाय अपराधियों के हौसले बुलंद करने वाले बयान दे रहे हैं। सवाल पूछे जाने पर प्रदेश की सत्तारूढ़ सरकार के मुखिया कहते हैं-‘‘हम अपना काम कर रहे हैं, आप अपना काम कीजिए‘‘। पर हकीकी मायनों में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े काम हो रहे होते तो कानून-व्यवस्था की चूलें इस कदर ढ़ीली न होतीं। प्रतिदिन कम से कम 10 बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में न आतीं। सिसकियां ले रही कराह रही बेटियों की चीखों की गंूज दूसरे देशों तक न पहंुचती। संयुक्त राष्ट के महासचिव ‘बान की मून‘ की ओर से बदायंू की बर्बरता पर कार्रवाई की मांग न की जाती। भारत में महिलाओं पर हो रही हिंसा पर अमेरिका हैरानी न जताता। पर देश की छवि खराब होती है तो क्या सत्ता का नशा उतरने वाला नहीं। यह तो सिर चढ़कर बोल रहा है। जिम्मेदार तो कहते हैं कि और जगहों पर भी बलात्कार होते हैं। उत्तर प्रदेश को बेवजह ही निशाना बनाया जा रहा है। यानि यह कोई खास बाद नहीं। हल्ला मचाने की कोई जरूरत नहीं। हद हो गई महिलाओं की सुरक्षा के मुद्दे पर संवेदनहीनता की। बदायंू में दो नाबालिग लड़कियों के साथ सामूहिक बलात्कार और उनकी नृशंस हत्या कर पेड़ से लटकाए जाने का मामला अभी शांत भी नहीं हुआ। सभी आरोपी पकड़े तक नहीं गए कि मुज्जफरनगर, अमेठी, मेरठ, गुड़गांव, राजस्थान, सहित प्रदेश और देश के अन्य इलाकों से भी मासूम बच्चियों और युवतियों के साथ बलात्कार के दो दर्जन से ज्यादा मामले प्रकाश में आए गए। हद तो यह है कि महिला मुख्यमंत्री वाले प्रदेश राजस्थान में भी बलात्कार के मामले प्रकाश में आ रहे हैं। जहां आरोप-प्रत्यारोप से ही जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने का दौर चल पड़ा हो वहां वसंुधरा राजे भी यह कहकर पल्ला झाड़ सकती हैं कि यूपी से भयावह स्थिति तो राजस्थान की नहीं है।
देश-प्रदेश की बेटियां खून के आंसू रो रही हैं पर आम जनता की रहनुमाई व हिफाजत के दावे करने वाले नेता महिलाओं की अस्मत की चिता पर भी राजनीति की रोटियां सेंकने से बाज नहीं आ रहे। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला जारी है। घटनास्थल पर हेलीकाॅप्टर से उतरते हैं। मिनरल वाॅटर पीते हैं। एसी गाडि़यों में बैठकर बलात्कार पीडि़त लड़कियों के घर का टूर करते हैं लेकिन इसके बाद भी अपनी ताकत और पद का इस्तेमाल अगला बलात्कार रोकने में नहीं कर पाते। लानत है ऐसे रसूख पर जो कमजोर व निर्बल की रक्षा न कर सके। मीडियावालों! बलात्कारों पर ब्रेकिंग न्यूज दे देकर विकास का मंुह ताक रहे दूर-दराज के गावों में मेले चाहे जितने लगवा लो। बाॅलीवुड वालों तुम क्यों रह गए। तुम भी आओ, बदायंू और उन्नाव की वीभत्स सत्य घटनाओं और उसपर चल रही नौटंकी पर ‘पीपली लाइव-टू-थ्री, बना लो। कुछ नहीं होने वाला। कुछ नहीं बदलने वाला। क्योंकि विश्व पटल पर संवेदनशीलता का ढ़ोंग रचाने वाला हमारा देश हकीकत में रोबोटिक युग में प्रवेश कर गया है। हम विदेशी ढर्रों का अनुसरण करते हुए डिब्बाबंद लंच-डिनर ले रहे हैं। ब्रांडेड पोशाकें पहन रहे हैं। हमारे पास बीएमडबल्यू और फेरारी जैसी कारें हैं। बस नहीं है तो स्त्री के प्रति संवेदना। वह भावनाएं नहीं हैं जो पर स्त्री को भी अपनी मां, बहन बेटी की तरह देखने की दृष्टि प्रदान करे। देश की गरीब और आम बेटियां भी यह बात जितनी जल्दी समझ लें उनके लिए उतना ही अच्छा रहेगा। क्योंकि उन्हें अपनी सुरक्षा के उपायों पर खुद ही विचार-विमर्श करना होगा। कठोर कदम उठाने होंगे। उन्हें समझना होगा कि हमारे देश-प्रदेश का शासकीय व सत्ताधारी तंत्र नपंुसक हो चला है, जो बेटियों की सुरक्षा की दिशा में कोई सकारात्मक फल देने में लाचार नजर आता है। क्या हुआ जो देश की छवि खराब हो रही है। इसकी मरम्मत सत्ताधारी अपनी कूटनीति से बाद में कर ही लेंगे।
जब किसी ‘वैश्विक महिला सम्मेलन‘ में विदेश से बुलावा आएगा तो बेटियों की तरक्की से संबंधित तमाम आंकड़े इकट्ठे करके फेहरिस्त पढ़कर सुना देंगे। बता देंगे कि यूपी में दलित समुदाय से अपनी पहचान बनाने वाली बहनजी मायावती भारत की उपलब्धि हैं। जिन्होंने बतौर मुख्यमंत्री प्रदेश की कमान चार बार सम्भाली है। वह दलित समुदाय की बेटियों के अधिकारों की झण्डाबरदार हैं। सीनातानकर कह देंगे कि वर्तमान समय में विधानसभा में 35 महिला एमपी हैं। देश के पास चार महिला मुख्यमंत्री हैं। आमचुनाव-2014 से 61 महिला सांसद चुनकर लोकसभा में भेजी गई हैं। अच्छे दिनों का सपना दिखाने वाले प्रधानमंत्री मोदी हैं। उनकी कैबिनेट में भी सात शक्तिशाली महिलाओं को जगह दी गई है। हमारे पास दो दर्जन से ज्यादा एक्सप्रेस-वे हैं। हम डबल डेकर फलाई ओवरों का निर्माण कर रहे हैं। हमने अग्नि-5 जैसी मिसाइल बना ली है। महिलाओं को खेत-खलिहानों में शौच के लिए न जाना पड़े इसके लिए ‘निर्मल ग्राम‘ योजना है। तो क्या हुआ योजना के लागू होने के बाद भी प्रचार ज्यादा और काम कम हुआ है। ग्रामीण इलाकों के 50 फीसदी घरों में शौचालय का निर्माण नहीं हो सका है। आप ये बलात्कार-वलात्कार जैसी बेकार की चर्चाएं छोडि़ए हमारे विकास के दूसरे पहलुओं पर नजर डालिए और तालियां बजाईए।
‘कल्पतरु एक्सप्रेस‘ में प्रकाशित लेख। फोटो ‘गूगल‘ से साभार।



दरिंदों का आसान शिकार क्यों बन रहीं प्रदेश की बेटियां

कितना गर्व महसूस करते हैं उन बेटियों के माता-पिता जब परीक्षा परिणाम घोषित होते हैं और बधाई मिलती है कि मुबारक को आपकी बेटी ने जिले या प्रदेश में टाॅप किया है। हां यह आजकल की बेटियां ही तो हैं जो शिक्षा हासिल करने से लेकर जीवन के हर मोर्चे पर कामयाबी के झण्डे गाड़कर यह साबित कर रही हैं कि वे किसी से कम नहीं। बेटियों की इस कामयाबी का श्रेय घर-परिवार वालों सहित हमारा समाज,शहर, प्रदेश और यहां तक कि देश भी लेना नहीं भूलता। अखबार में खबर छपती है कि फलां-फलां शहर की बेटी ने नाम रोशन किया। पितृसत्तात्मक समाज में लम्बे संघर्ष के बाद अपनी काबलियत के दम पर बेटियां आज अपनी पहचान बनाने में सक्षम हैं। ऐसे में तो यह बेटियां प्रोत्साहन और ईनाम की हकदार बनती हैं। फिर क्यंू इन्हें तिरस्कार, अपमान और अस्मत लुट जाने का भय बांटा जा रहा है। क्यों ऐसे घिनौने और दिल दहला देने वाले काण्ड अंजाम दिए जा रहे हैं कि इन बेटियों के आगे बढ़ते कदम ठिठकने को मजबूर हैं। बेटियों को सरेआम रास्ते से उठा लेना। उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म करना और फिर मारकर पेड़ से लटका देने जैसा जघन्य अपराध विकासशील देशों की रेस में तेजी से आगे बढ़ते हुए भारत के लिए बेहद शर्मनाक और भर्तसनीय है।
एक ओर बेटियों की तरक्की के लिए तमाम तरह की योजनाएं चलाई जाती हैं। उनके हाथों में स्मार्टफोन और लैपटाॅप थमाए जाते हैं। उनकी इच्छाओं को पंख देने के दावे किए जाते हैं और दूसरी ओर सैकड़ों परिवारों को बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया नहीं कराई जातीं। शौचालय नहीं मुहैया कराए जाते। बदायंू में दो चचेरी बहनें शाम के वक्त घर से शौच करने ही निकली थीं। सरकारी अधिकारी खुद यह बयान देते हैं कि ग्रामीण और दूर-दराज के घरों में शौचालय न होने के कारण ज्यादातर बलात्कार की घटनाएं घटित होती हैं। वाह रे आधूनिकता, वाह रे तरक्की! शासन-प्रशासन का यह कैसा दोमंुहापन है। बदायंू मामले में पुलिसकर्मी लिप्त पाए गए हैं। यह उत्तर प्रदेश के पुलिसियातंत्र के मुंह पर एक तरह से कालिख पुतना है। मामले में पीडि़त परिवार की ओर से सीबीआई जांच की मांग और इस मांग का चैतरफा समर्थन भी उत्तर प्रदेश पुलिस की विश्वसनीयता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है। जिस प्रदेश का मुखिया बलात्कार के संदर्भ में यह बयान दे कि लड़के हैं गलती हो जाती है उस प्रदेश में बेटियों के साथ बलात्कार जंगल में खरगोश का शिकार करने जैसा आसान हो जाए तो हैरानी की क्या बात है! पुलिस की ओर से अपराधिक मामलों में सुनवाई में देरी करना। पीडि़त पक्ष को ही मारपीटकर भगा देना। अपराधियों के साथ मिलकर अपराध को अंजमा देने से ही दबंगों और अपराधियों के हौसले बुलंद हो रहे हैं। आयदिन बलात्कार की घटनाएं बढ़ रही हैं। बंदायंू, आजमगढ़, बागपत, मुज्जफरनगर और आगरा सहित महीनेभर में उत्तर प्रदेश से दर्जनभर से ज्यादा सामूहिक बलात्कार की घटनाएं प्रकाश में आ चुकी हैं और लगातार आना जारी हैं।
बदायंू में बलात्कार की शिकार दो बहनों में से एक लड़की के पिता ने कहा-‘‘जिस तरीके से हमारी लड़कियों को पूरी दुनिया ने लटके देखा, हम चाहते हैं कि वह दोषियों को भी फांसी के फंदे पर लटके देखे‘‘। यानि वे दोषियों के लिए सरेआम फांसी से कम सजा नहीं चाहते। चाहना भी नहीं चाहिए। भारतीय कानून में इससे भी कड़ी सजा का प्राविधान यदि होता तो पीडि़त और संवेदनशील लोग बंदायंू जैसे वीभत्स काण्ड के दोषियों के लिए जरूर मांग करते। लेकिन इसके बाद भी बड़ा सवाल यह है कि क्या कानून सख्त कर देने और देश के अंतिम पीडि़त व्यक्ति की पहंुच न्याय तक बना देने से बेटियों के साथ बलात्कार की घटनाएं घटित होना बंद हो जाएंगी? जवाब हां या न में कोई नहीं दे सकता। क्योंकि महिलाओं पर अत्याचार के लिए हमारा पूरा सामाजिक ताना-बाना और घर परिवार में बेटा-बेटी की परवरिश में भेदभाव भी कहीं न कहीं जिम्मेदार है। महिलाओं के लिए समग्ररूप से जबतक सामाजिक और पारिवारिक सोच में बदलाव नहीं आएगा तब तक बात नहीं बनने वाली।
बदायंू जैसे काण्ड का एक पिछला उदाहरण याद आता है। दिल्ली के ‘निर्भया काण्ड‘ को अभी इतना वक्त नहीं बीता कि इसकी यादें धंुधली पड़ जाएं। चलती बस में मेडिकल छा़त्रा के साथ मारपीट की गई। सामूहिक बलात्कार हुआ। जिसके कारण कुछ दिन बाद लड़की की मौत हो गई। देशभर खासतौर से दिल्ली में इस काण्ड के खिलाफ देशभर में पुरजोर तरीके से आवाज उठाई गई। मामले की जांच के लिए स्पेशल टास्क फोर्स गठित की गई। फास्ट टैक कोर्ट में मामला चलाया गया। नतीजे में छह दिन के भीतर आरोपी पकड़े गए। बिना पंचनामा पोस्टमार्टम हुआ। सात महीने में 130 सुनवाई हुईं। पुलिस ने 88 गवाह पेश किए गए। इंटरनेशनल वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए बयान दिलवाए गए। चार आरोपियों को फांसी की सजा हुई। जनता के दबाव पर और इस घटना का संज्ञान लेते हुए ही बलात्कार के खिलाफ कानून में बदलाव किया गया। आईपीसी की धारा-376-ई, के तहत अधिकतम सजा मृत्युदंड कर दी गई। मामले को आज भी ‘‘निर्भया केस‘‘ नाम से जाना जाता है। निर्भया केस में जिस तरह से त्वरित कार्रवाई और दोषियों को सजा हुई उससे कानून पर महिलाओं का भरोसा पक्का हो चला था। पर इसके बाद क्या हुआ? विश्वास फिर टूटा। महिलाओं और नाबालिग लड़कियों की अस्मत से खिलवाड़ नहीं रुका। निर्भया केस के बाद पहले आठ महीनों में ही दिल्ली में एक हजार से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज किए गए। बदायंू मामले में भी सीबीआई जांच की सिफारिश खुद प्रदेश सरकार की ओर से कर दी गई है। अपराधी पकड़े गए हैं। फास्ट टैक कोर्ट में मामला चलाने के आदेश दिए गए हैं। सम्भव है कि निर्भया केस की ही तरह इस मामले में भी दोषियों को फांसी की सजा दिलाने में कामयाबी मिल जाए पर सवाल फिर वही है कि क्या इसके बाद पुलिस का रवैया सुधरेगा। बलात्कार नहीं होंगे!
परिवार और समाज भी हैं जिम्मेदार
दरअसल भारतीय समाज में स्त्री-पुरुष की समानता और कंधे से कंधा मिलाकर चलने की ज़बानी पैरोकारी तो बहुत होती है लेकिन भीतरी और जमीनी हकीकत जुदा है। जहां बेटा-बेटी को समान परवरिश देने की बात आती है वहां आज भी करोड़ों माता-पिता और समाज और धर्म के कथित ठेकेदारों के सुर बदल जाते हैं।  महिलाओं के अपमान,हिंसा और यहां तक सामूहिक बलात्कार जैसे जघन्य अपराध के पीछे कहीं न कहीं हमारे भारतीय परिवारों में बेटियों को दबाकर रखने और बेटों की अराजकता को मर्दाना फितरत कहकर टाल देने प्रवृत्ति जिम्मेदार है।
 ‘कल्पतरु एक्सप्रेस‘ में प्रकाशित लेख। फोटो ‘गूगल‘ से साभार।

 

Sunday, 25 May 2014

अधूरा है अभी आधी आबादी का सफर

गजरा,टीका, सिंदूर, बिंदिया,आई लाइनर,आई षेडो,काजल,बेस पाउडर,फेस पाउडर,क्रीम,लिप लाइनर,लिपिस्टिक,कान में बाला,गले में मंगलसूत्र,हाथों में चूडियां,मेंहदीं,नाखून पाॅलिष, कमरबंद,पैरों में पायल और बिछिया। उफ! कम से कम इतना तो श्रंगार करती ही हैं, भारतीय दुल्हनें। बैंकिंग सेक्टर में काम करने वाली सहेली की षादी पर उसे इतना ही सजे देखकर पूछा क्या तुम इतना सब करने के बाद सहज महसूस कर रही होघ् उसका जवाब था षादी कर रही हंू, आज तो सबसे अच्छा लगने का हक बनता है मेरा। मैंने ठंडी सांस भरते हुए मनही मन कहा- बिना साज श्रंगार तुम खुद ही अपने आप को पसंद नहीं करतीं तो किसी और को दोश क्या देना। तुम समझतीं क्यंू नहीं कि यह हीनता की भावना बाजार के पितामाह ठूंस रहे हैं तुम्हारे अंर्तमन में। यह बात तुम्हारे मन में घर कर जाए कि तुममे कोई कमी है, जिसके लिए तुम्हारा मेकओवर जरूरी है, तभी तो लिपिस्टिक,पाउडर,गहने-कपडों और ऐन-तेन का बाजार फले-फूलेगा। तुम इन गडबडझालों में उलझी रहो। अपनी रंगी-पुति क्षवि देखकर खुष होती रहो और अपने असल मुद्दों से तुम्हारा ध्यान बंटा रहे ताकि बाजार में तुम्हें एक कमोडिटी की तरह पेष किया जा सके यही तो पित्र सत्ता और पंूजीवादी लोगों की चाल है।
षिक्षित और हाई-प्रोफाईल समुदाय के लोगों के बीच महिलाओं को उनके पति के नाम से जाने जाने का खास तरह का चलन बडा पुराना है। हाई-प्रोफाइल पार्टियों में अक्सर महिलाएं एक दूसरे को मिसेज भाटिया, मिसेज षर्मा, मिसेज खान वगैरह-वगैरह के सम्बोधन से बुलाती हैं। महिलाओं को यह बात चुभती क्यों नहीं ! षादी के बाद इस तहर के प्रोटोकाॅल निभाने वाली कोई महिला क्या इस बात की गारण्टी दे सकती है कि उसका पति सदा उनका ही  बनकर रहेगा। अपने नाम के आगे पति का नाम जोड़नेे से पति बेवफाई नहीं करेगा। अगर तुम ष्योर नहीं तो फिर  खुद के नाम के बजाय मिसेज फलाने -ढिमका कहलाने, लिखने का क्या फायदा।
महिलाएं जितना समय सामाजिक-धार्मिक आडम्बर निबटाने में लगाती हैं उतने समय में अपने अधिकारों के बारे में जानें तो उनके साथ होने वाली षारीरिक ,मानसिक और आर्थिक हिंसा काफी हद तक कम हो जाए। धर्म षास्त्रों ने  तो महिला को दोयम दर्जे का पराश्रित और असहाय बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी है। यहां महिला पुरूश की दासी ही बताई जाती है। जब महिलाओं के बढ़ते कदमों को घर-पति, बच्चों और समाज की दुहाई देकर भी रोकना नामुमकिन हो जाता है तब उन्हें धर्म का डर दिखाया जाता है। महिलाओं के लिए गीता, कुरआन और बाइबिल में फलां-फलां उपदेष की दलीलें दी जाती हैं।
कामकाजी हो तब भी घर की साफ-सफाई या खाना पत्नी ही बनाए।  बच्चों का लालन-पालन करे, पति और सास-ससुर की सेवा करे, क्योंघ् क्योंकि यह सब काम निचले दर्जे के हैं पुरूश के अंह को ठेस पहंुचाते और महिलाओं पर ही जंचते हैं। आंटी, बुआ ताई चाची  या मामी आप किसी से पूछकर देख लीजिए लगभग यही जवाब मिलना तय है। पति-पत्नी दोनों के कामकाजी होने पर असमय मेहमान घर पर आ जाएं या कोई घर का सदस्य बीमार पड जाए तो आॅफिस से छुट्टियां लेने का दायित्व भी पत्नी जी का ही है। षहर से बाहर जाने, देर रात तक घर से बाहर रहने की भी अनुमति अभी मध्यमवर्गीय परिवारों में तो महिलाओं को नहीं मिलती। यह सब चोचले तो हाई-प्रोफाईल महिलाओं के समझे जाते है। ऐसे अवसरों के लिए पत्नी की देह के एकाधिकारी पति को बाॅडीगार्ड बनाकर  साथ ले जाना पड़ता है। ऐसा न करने पर उन्हें खुद भी आत्मग्लानि होने लगती है। क्योंकि बचपन से ही उन्हें इस तरह के नियम-कायदे सिखाए जाते हैं। आज वे तो बस इस बात से ही बेहद खुष हैं कि उन्हें काम करने के लिए घर की दहलीज पार करने की अनुमति मिली हुई है।बेचारी सषक्त महिला!
सिनेमा वगैरह में महिलाओं की सषक्त छवि दिखाना पर उस छवि को सामाजिक पटल पर स्वीकार करना दो अलग-अलग बातें हैं। यह एक  अजीब किस्म का दोहरापन है। यंू तो भारतीय सिनेमा पष्चिमी सिनेमा की धड़ल्ले से नकल पीट रहा है,लेकिन सिर्फ अष्लीलता के पैमाने पर। जब बात स्त्री पुरूश की बराबरी की आती है  तो यह पलटी मार जाता है। काॅकटेल फिल्म की कहानी कुछ ऐसी ही हकीकत दर्षाती है। फिल्म की कहानी के मुताबिक आदर्ष पत्नी बनने की रेस में वह महिला हार जाती है जो पुरूशों के समकक्ष बिंदास जीवन जीती है। षराब पीती है। लेट नाइट डिस्को जाती है। ब्वाॅयफ्रेंड से सेक्स करती है। लिव इन रिलेषन में रहती है,लेकिन जब षादी की बारी आती है तो उसका ब्वाॅयफ्रेंड एक सीधी सादी, घरेलू टाइप महिला के लिए उसे छोड़ देता है। फिल्म मेकर यही कहते हैं  िक वे वही दिखाते हैं जो समाज की हकीकत है। यानि फिल्म संदेष देती है कि हमारे समाज में किसी की पत्नी बहू बनने के लिए सलवार कुर्ता पहनना, खाना बनाना,भगवान में विष्वास करना ,यौवन की पवित्रता बनाए रखने जैसी क्वालीफिकेषन जरूरी  है। सो काॅल्ड खुले विचारों के लोग तो चाहते हैं कि इसके साथ ही अगर लड़की जाॅब भी कर रही हो तो सोने पर सुहागा। ये सब बातें पुरूशों पर लागू नहीं होतीं।
टेलिविजन पर इस तरह के विज्ञापन प्रसारित होना आम बात हैं कि न्यू ब्रांड परफयूम या डियोडरेंट  लगाकर महिलाओं के सामने से पुरूश गुजर जाएं तो वे महज इनकी खुषबू से मदहोष होकर अपना षील भंग कर सकती हैं।  इस तरह की विक्रित मानसिकता का संदेष देनेवाले विज्ञापनों का हिस्सा बनने से महिलाओं को परहेज करना चाहिए। उन्हें यह समझ बनानी होगी कि इसी तरह की पंूजीवादी सोच खुद महिलाओं को महिलावाद के खिलाफ खड़ा करती है। इन विज्ञापनों में काम करने वाली महिलाओं से मैं मनरेगा  के तहत काम करने वाली उस महिला को सषक्त  कहंूगी जो गारा-मिट्टी ढ़ोकर जीविका चलाती है।  एक काॅलोनी में मैंनें दो किस्म की महिलाएं देखीं एक जो  पति के लात-जूते दिन-रात इसलिए खाती है क्योंकि वह उसका और उसके बच्चों का पेट पालता है। इस महिला ने मानों अपना अपमान करवाना स्वीकार कर लिया है। षायद इसलिए वह कहती है कि आदमी को गुस्सा आएगा तो वह बीवी पर ही तो निकालेगा और कहां जाएगा! जूते खाकर भी अत्याचारी पति की पक्षदारी। मुझे लगता है ऐसी पतिव्रता स्त्रियां तो केवल हमारे देष में ही पाई जाती हैं।  दूसरी ओर उसी काॅलोनी में रहने वाली उस महिला से भी मैं मिली हंू जिसने पति के आयदिन की मारकुटाई और गालियों से तंग आकर तलाक ले ली। तलाक से पहले यह गाढे़ किस्म की घरेलू महिला थी लेकिन तलाक के दो साल बाद ही आज अपनी जीविका स्वंय चला रही है और षान से जी रही है। समाज महिलाओं के लिए तलाक को जितना बुरा मानता है, दरअसल वह इतना बुरा है नहीं। महिलाओं को जरूरत है तो सिर्फ अपनी षक्ति पहचानकर जुल्म के खिलाफ उठ खड़े होने की।
बच्चे का होमवर्क कराना हो,पैरेंट-टीचर मीटिंग अटेंड करनी हो  या एनुअल डे निबटाना हो तो मम्मी फस्र्ट लेकिन काॅलेज के एडमिषन फार्म, पहचानपत्र पर पापा का नाम ही  लिखना अनिवार्य है। कहीं-कहीं मम्मी का भी है, लेकिन पापा के नीचे वाले काॅलम में। रसोई सम्भाले मां या पत्नी पर राषनकार्ड में मुखिया के काॅलम में पति या ससुर का नाम । मतदाता पहचानपत्र अथवा आधार कार्ड में वाइफ आॅफ  या डाॅटर आॅफ वाले काॅलम में पति या पिता का नाम  भरता अनिवार्य है। यानि पुरूश के नाम के बिना हमारा सरकारी तंत्र भी महिलाओं  को उनकी पहचान नहीं दे सकता। महिला कामकाजी हो तब भी नहीं। सरकारी दस्तावेजों में वह आज भी पराश्रित ही है।
कहने का आषय यह है कि आधी आबादी ने घर की दहलीज लांघने, स्कूल-काॅलेज में षिक्षा हासिल करने और विभिन्न क्षेत्रों में जीविका कमाने तक के सफर के लिए मीलों का फासला तय किया है। कितने बंधन तोडे हैं,कितने आंदोलन छेड़हैं और न जाने कितने टकराव झेले लेकिन  महज घर से निकलकर काम करने वाली महिला को देखकर महिलाएं तो बड़ी सषक्त होगईं हैं, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। महिलाओं के प्रति पित्रसत्तात्मक सोच को बदलने के लिए अभी बाकी का सफर बहुत लम्बा और कहीं ज्यादा मुष्किलभरा है।  महिलाओं को खुद भी सषक्तिकरण के प्रति अपनी समझ को विस्तार देना होगा। धर्म, परम्परा और रिवाज के नाम पर अनदेखे-अनजाने बंधन अभी अनगिनत हैं। जिनको तोड़ने  के लिए लड़ाई अभी और लम्बी  चलनी हैं।
नोट.हिन्दी दैनिक  कल्पतरु एक्सप्रेस में प्रकाषित लेख
फोटोःसर्च इंजन गूगल से साभार

Tuesday, 20 May 2014

कहानी-नया सवेरा


वसंत का महीना था। चारों ओर हरियाली थी। सुबह की ठंडी-ठडी हवाएं वातावरण में सिहरन पैदा कर रही थीं। आम, फलेंदा, बेर और गुल मोहर केे पेड़ों पर रंग-बिरंगी चिडि़यां ऐसे चहचहा रही थीं जैसे बारात के आने पर दुल्हन की सहेलियां शोर मचाने लगती हैं। खेतों में तैयार सरसों की फसल इठला रही थी। आकाश में छिटकी लाली सूर्योदय का पता दे रही थी। आधे पक्के, आधे कच्चे घर के भीतर खटिया पर सोई हुई सांवली रंगत,तीखे नैन नक्श व लम्बे-घनेबालों वाली नवयौवना गहरी नींद में सोई हुई थी। दूर के मंदिर से आती हुई घंटियो और भजन की आवाज से अचानक उसकी नींद टूटी। यह थी ‘संध्या‘।
संध्या इस वर्ष हाई-स्कूल की परीक्षा दे रही थी। वह प्रतिदिन प्रातःकाल पांच बजे उठकर अध्ययन करती थी। संध्या का मानना था कि प्रातःकाल पढ़ने से पाठ पक्का याद हो जाता है। आंखे मलते हुए संध्या ने खटिया के सिरहाने पड़ी अपनी ओढ़नी उठाई और उसे गले में लपेटते हुए झट से उठकर बैठ गई। उसने अपने अगल-बगल नजर दौड़ाई। दूसरी खटिया पर उसके अम्मा और बाउ जी दोनों गहरी नींद में सो रहे थे। अम्मा को ‘घोड़े बेचकर सोया‘ देख संध्या का मन नहीं हुआ कि वह उन्हें खेत तक साथ चलने के लिए जगाए। दरअसल संध्या के घर में शौचालय नहीं था। संध्या ही क्या उसके गांव के अधिकतर घरों में शौचालय की सुविधा नहीं थी। यही कारण था कि गांव जहां एक ओर प्राकृतिक संपदा से भरपूर था तो वहीं दूसरी ओर गांव में फैली गंदगी उसकी संुदरता में दाग लगा रही थी। गांव के लोगों को खेत-खलिहान जाकर ही नित्यक्रिया से निपटना होता था। संध्या शौच के लिए सदा अम्मा के साथ ही खेत पर जाया करती थी। पर आज उसने अम्मा को चैन से सोते देखकर नहीं जगाया और अकेले ही पानी का लोटा लेकर खेत की ओर चल दी।
संध्या के घर से खेत यही कोई आधा किलोमीटर की दूरी पर थे। तेज-तेज कदमों से चलते हुए वह थोड़ी ही देर में गंतव्य तक पहंुच गई। वह नित्यक्रिया के लिए उपयुक्त स्थान खोज रही थी। जल्द ही उसे खेत के एक ओर घनी झाडियां दिखाई दे गईं। उसने सलवार नितंबों से नीचे खिसकाई और झट से झाडि़यों में घुस गई। संध्या मन ही मन परीक्षा के लिए तैयार किए हुए उत्तर भी दोहरा रही थी। अचानक उसे अपनी कमर के दोनों ओर किसी के हाथों का स्पर्श महसूस हुआ। संध्या घबरा कर जोरदार झटके से पलटी लेकिन इतनी देर में उसे स्पर्श करने वाले व्यक्ति ने झाडि़यों में ही चित कर दिया। संध्या अर्धनग्न अवस्था में बदहवास सी पड़ी हुई थी। वह चीख भी नहीं सकती थी। क्योंकि स्पर्श करने वाले व्यक्ति ने उसका मंुह अपने एक हाथ से बंद कर रखा था। संध्या ने देखा कि वह व्यक्ति कोई और नहीं उसके घर दूध पहंुचाने वाला अधेड़उम्र का ननकू था। संध्या कामेच्छा में अंधे ननकू से खुद को बचाने की पूरी कोशिश कर रही थी। इसी जद्दोजहद में वह साथ लाया हुआ पीतल का लोटा उठाने में सफल हो गई। आव देखा न ताव उसने अपनी पूरी ताकत से लोटे को ननकू के सिर पर दे मारा। ननकू के सिर से खून की धार बह निकली। वह वहीं झाडि़यों में ढेर हो गया। बदहवास संध्या ने अपनी सलवार तेजी से कमर पर बांधी और घर की ओर सरपट दौड़ पड़ी।
हांफती हुई संध्या घर के भीतर दाखिल हुई तो देखा अम्मा और बाउ जी अभी भी सोए हुए थे। उसने जल्दी से अपने कपडे़ ठीक करते हुए हाथ-मंुह धोया, पानी पिया और अम्मा के चरणों में बैठकर घुटी-घुटी आवाज से रोने लगी। आहट से अम्मा की आंख खुल गई। इतनी देर में संध्या की सांसें काफी हद तक काबू में आ चुकी थीं। अम्मा ने चारपाई से उठते हुए पूछा-‘‘अरी संधू क्या आज परीक्षा देने नहीं जाना? सवेरा हो गया और तूने मुझे जगाया भी नहीं! चल पहले खेत हो आते हैं।‘‘ संध्या बिना कुछ उत्तर दिए ही अम्मा की छाती से चिपक गई। अम्मा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा-‘‘क्या हुआ बिटिया कोई परेसानी है का।‘‘ मासूम संध्या ने आंखें भींचकर जवाब दिया-‘‘नहीं अम्मा आज अंग्रेजी की परीक्षा है न थोड़ा डर लग रहा है।‘‘ संध्या ने अपने आंसू छिपा लिए थे। इस डर से कि यादि वह सबकुछ अम्मा को बता देगी तो गांव में बडा हंगामा खड़ा हो जाएगा। अंग्रेजी का पर्चा तो छूटेगा ही बदनामी होगी सो अलग। यह सब सोंचकर उसने अपने साथ हुए यौन हमले की बात को फिलवक्त मन में ही दफन कर देना उचित समझा।
गर्मी अपने चरम पर थी। संध्या के साथ हुए यौन हमले को काफी दिन बीत चुके थे। संध्या घर के पिछवाड़े खपरैल वाले सेहन में व्याकुलता से चहल-कदमी कर रही थी। आज उसके परीक्षा परिणाम घोषित होने वाले थे। तभी उसकी सहेली गरिमा वहां पहंुची। उसने ‘‘मोबाईल इंटरनेट‘‘ के माध्यम से पता लगाकर संध्या को खुशखबरी दी कि परीक्षा में वह प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुई है। संध्या ने यह सुनकर खुशी से उछलते हुए गरिमा को गले लगा लिया। इतने में उसकी अम्मा और बाउ जी भी जो बेटी की दिनरात की मेहनत का नतीजा जानने के लिए उतावले थे वहां आ पहंुचे। संध्या के बापू ने झट से बेटी का माथा चूमा और पूछा कि ‘‘बिटिया तोहका उपहार में का चाही?‘‘ संध्या के मंुह से अनायास ही निकला ‘‘बाउजी घर में शौचालय बनवा दो।‘‘
संध्या ने बताया कि उसने टेलीविजन पर विज्ञापन में देखा है कि सरकार ‘‘निर्मल भारत अभियान योजना‘‘ के तहत ग्रामीण लोगों के घर में शौचालय निर्माण में मदद कर रही है। इसका जिम्मा ग्राम पंचायतों को सौंपा गया है। ग्राम पंचायत से बात की जाए तो उनके घर भी शौचालय बन सकता है। संध्या के बाउ जी ने कहा, ठीक है। मैं आज ही जाकर ग्राम प्रधान से बात करूंगा। संध्या के पिता ने वादे के मुताबिक ग्राम प्रधान से योजना की पूरी जानकारी ली और जल्द ही संध्या के घर शौचालय बनकर तैयार हो गया। अब संध्या के घर से कोई भी नित्यक्रिया के लिए खेतों में नहीं जाता था। यही वह समय था जब संध्या ने अपनी सहेली गरिमा और अपनी अम्मा से यौन हमले की बात बताई। संध्या की अम्मा ने उसके बाउजी से सब बता दिया। बाउजी ने थाने जाकर ननकू के खिलाफ रपट लिखवाई लेकिन ननकू पहले से ही पकड़े जाने के डर से गांव से फरार हो चुका था। जबकि संध्या और गरिमा ने साथ मिलकर गांव की अन्य लड़कियों को भी अपने-अपने घरों में शौचालय बनवाने के लिए प्रेरित करने का संकल्प लिया। कुछ माह में ही संध्या के गांव के अधिकतर घरों में शौचालय बनकर तैयार हो गए।

नोटः जागरुकता के अभाव और सरकारी योजनाओं की विफलता के चलते आज भी हजारों महिलाएं खुले में शौच करने को मजबूर हैं। यह स्थिति शिष्टाचार के खिलाफ तो है ही, इससे महिलाओं पर दुराचार व यौन हमलों को भी बढ़ावा मिलता है।


Thursday, 8 May 2014

प्रेम विवाह की पर्यायवाची न रह जाए ’कोर्ट मैरिज’


सात फेरे लेकर दांपत्य जीवन में प्रवेश करें या ’कबूल’ है बोलकर किसी को अपना जीवनसाथी बनाएं। विवाह वैध तो अब तभी माना जाएगा जब इसका कानूनी तौर से पंजीकरण कराया जाए। अब तक भारत में आमतौर पर शादी के कानूनी पंजीकरण को ’प्रेम विवाह’ का पर्यायवाची ही माना जाता रहा है। इसका अंदाजा मुझे इस बात से हुआ कि मिसेस दीक्षित को पति के साथ विदेश जाना था। पासपोर्ट बनवाने और वीजा के लिए उन्हें नाक से चने चबाने की नौबत आ गई। यहां उन्हें जरूरत पडी खुद को दीक्षित जी की ’लीगल वेडेड वाइफ’ साबित करने के लिए ’मैरिज सर्टिफिकेट’ की जो उनके पास नही था। सहेली से अपना दर्द बयां करते समय वह तपाक से बोलीं कि एै है कोई घर से भागकर कोर्ट मैरिज तो की नहीं थी जो सर्टिफिकेट पास होता। ये बात मुए सरकारी अफसरों को कौन समझाए।
विवाह के कानूनी पंजीकरण या ’मैरिज सर्टिफिकेट’ की उपयोगिता के प्रति जागरूकता की कमी है। यही कारण है कि कोर्ट या तहसील में रजिस्ट्ार आॅफिस में दर्ज होने वाली शादियों की संख्या बेहद कम है। आमजनों को शादी के लीगल सर्टिफिकेट की कीमत का अंदाजा उस समय ही होता है,जब शादीशुदा संबंधों में किसी तरह की दरार पडने पर मामला कोर्ट तक पहंुचता है अथवा विदेश जाने के लिए शादीशुदा जोडों को इसकी जरूरत पडती है। कोर्ट में चल रहे मामले में पति से कानूनी हक पाने के लिए ज्यादातर महिलाओं को खुद को ब्याहता साबित करने में ही पसीने छूट जाते हैं। तमाम फर्जीवाडों और दलाली के चलते आर्य समाज मंदिरों से मिले शादी के प्रमाण और निकाहनामों को कोर्ट संदेह की द्ष्टि से देखता है। ऐसे में केंद्र सरकार की ओर से हर  धर्म-जाति के लोगों के लिए कानूनी रूप से विवाह पंजीकरण अनिवार्य करने का फैसला काबिले तारीफ है। फैसले पर मुहर लगाने के लिए सरकार इसके लिए विधेयक लाने की तैयारी में है। विधेयक पास होकर लागू हुआ तो इससे गैर कानूनी शादियों और बाल-विवाह पर भी काफी हद तक लगाम लगने की उम्मीद है। कानूनी रूप से शादी के पंजीकरण के लिए पण्डितों और धर्म गुरुओं के योगदान की भी जरूरत है। यह अपने-अपने समुदाय को इसके लिए जागरूक व प्रेरित कर सकते हैं। फिक्र इस बात की है कि जब पंजीकरण सबके लिए ही अनिवार्य होगा तो पंजीकरण कराने वालों की संख्या द्रुत गति से बढेगी।
हमारे सरकारी सिस्टम की बदहाली और इसकी कार्य प्रणाली की कछुआ चाल से कौन वाकिफ नही है। सरकारी सुस्ती के कारण राशन कार्ड, निवास प्रमाण पत्र या पहचानपत्र बनवाने में जितना समय लगता है। बस समझ लीजिए शादी का लीगल सर्टिफिकेट मिलने में भी उतना ही समय लग सकता है। यह स्थिति तब है जब विवाह पंजीकरण कराने वालों की संख्या अकेले अपने शहर में ही हर साल 300 का भी आकंडा पार नहीं कर पाती। ’स्पेशल मैरिज एक्ट-1954 के तहत केवल धारा पांच का फार्म वर-वधू दोनो को अलग अलग भरकर मैरिज कोर्ट में जमा करना होता है,लेकिन केवल फार्म भरकर जमा करनेभर से पंजीकरण नहीं माना जाता। मजिस्ट्ेट की अनुमति के बाद ही सर्टिफिकेट जारी किया जाता है। औसतन इसमें एक माह से दो माह का समय तो लगता ही है। अब अगर सभी के लिए पंजीकरण अनिवार्य होगा तो पंजीकरण कराने वालों की संख्या सैकडों से लाखों में भी बदल सकती है। सर्टिफिकेट मिलने में महीने के बजाय साल का समय लगेगा। इस स्थिति से बचना है तो ई- गर्वनेस का सपना जो अभी तक कोर्ट-कचेहरियों में पूरी तरह लागू नहीं हो सका है, पूरा करना ही होगा। सरकार की ओर से आॅनलाइन मैरिज रजिस्ट्ेशन की शुरुआत भी करनी होगी। नहीं तो भला कौन सा नव-विवाहित जोडा चाहेगा कि वह नए जीवन की शुरुआत में ही पंजीकरण से लेकर सर्टिफिकेट हासिल करने के लिए कोर्ट-कचेहरी के चक्कर काटते रहे। नए कानूनों के साथ सरकारी सिस्टम का भी नवीनीकरण जरूरी है। नहीं तो नया विधेयक भी उन्हीं कानूनो की जमात में शामिल हो जाएगा जो पहले से लागू होने के बाद भी ठंडे बस्ते में पडे हैं। हम वहीं खडे रह जाएंगे जहां से चले थे और शादी का कानूनी पंजीकरण या ’कोर्ट मैरिज’ ’प्रेम विवाह’ के पर्यायवाची तक ही सीमित रह जाएगा।

नोट-मेरा यह लेख हिन्दी समाचारपत्र कैनविज टाइम्स में प्रकाशित हो चुका है।

Sunday, 4 May 2014

हमने सुना है!


हमने सुना है लोकसभा चुनाव में इसबार बड़ी हुड़दंग मची है। चरम की जुबानी माराकाटी चल रही है। नेता चचेरे भाईयों की तरह लड़-झगड़ रहे हैं। कोई किसी को पप्पू बुला रहा है तो कोई किसी को फेंकू। चुनावी अखाड़े में कोई कच्चा खिलाड़ी बताया जा रहा है तो किसी के विकास के माॅडल की तुलना टाॅफी से हो रही है। किसी के दीन-दुखियों की सुध-बुध लेने को ‘गरीबी का टूरिज्म‘ करार दिया जा रहा है तो कोई देश के चैकीदार बनने के इच्छुक अभ्यर्थी को रातों-रात जेल की हवा खिलाने की बातें कर रहा है। 
इस सब के बीच एक मौनी बाबा भी हैं जो कुछ भी हो जाए भले ही सत्ता लुट जाए, राजपाट रहे न रहे पर उनका मौन व्रत तोड़ना नामुमकिन है। हमारे नेतागण अपने प्रतिद्वंदी से रिश्ते-नाते जोड़ने में भी पीछे नहीं हैं। पापा की बहन होने के नाते पापा के पुत्र की वह बुआ बन गई हैं तो विरोेधी खेमे की स्टार प्रचारक को चिंटू का स्त्रीलिंग चिंटी बताने के लिए बेटी बनाने से भी गुरेज नहीं किया जा रहा। चुनाव प्रचार के दौरान थप्पड़-लप्पड़ भी खूब चल रहे हैं। किसी खास वर्ग को बोरिया बिस्तर बांधकर पाकिस्तान भेजने के सपने भी देखे जा रहे हैं। हालांकि ऐसे भाषण देने वाले अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने का काम कर रहे हैं और अपनी कंपनी की नई-नई मार्केटिंग पाॅलिसी की धज्जियां उड़ा रहे हैं। पर कुछ भी कहिए आम जनता इस हुड़दंग के खूब मजे लूट रही है। इसके चलते टीवी चैनलों की टीआरपी और अखबरों का सर्कुलेशन भी जरूर बढ़ा है। लोगों से बातचीत के आधार पर ऐसा मेरा मानना है।
जब किसी को कुछ कहते नहीं बनता तो मीडिया को ‘लहर-जहर‘ का जिम्मेदार भी ठहराया जाता है। भई मीडिया तो जैसे बनी ही इसलिए है कि बुरी कहे तो चपाट खाए-खाए, अच्छी कहे तो भी कोसी जाए।
बु़़द्धीजीवी वर्ग इस जुबानी मारकाट वाले हुड़दंग की आलोचना कर रहा है। पर आम आदमी तो बड़े मजे ले रहा है। मजे-मजे में ही इसबार जनता बड़ी जागरूक हो गई है। बेकार की बातें पढ़ने-सुनने के बहाने कुछ काम की बातें पता लगी जा रही हैं। चाय के होटलों पर फालतूगीरी करने वाले चाय पीते-पीते चुनावी प्रक्रिया के बेसिक ज्ञान से रूबरू हुए ले रहे हैं, क्योंकि ‘‘ठेले पर चाय बेचने वाला व्यक्ति चुनावी ज्ञान का प्रोफेसर हो गया है।‘‘ पर कुछ भी कहिए इतना सुनने-देखने के बाद हम तो इस निष्कर्ष पर पहंुचे हैं कि चाहे इसबार के राजनैतिक प्रचार में जिन नए-नए सूक्ति वाक्यों और मुहावरों का प्रयोग हो रहा है, उससे आम पब्लिक आनंद लेते हुए चुनावी महापर्व का इतिहास, भूगोल व गणित सब अपनी आसान भाषा में समझ रही है।
तभी तो देखिए इसबार के चुनाव में नोटिस करने योग्य मतदान प्रतिशत बढ़ा है। महिलाएं भी वोटिंग के मामले में पुरुषों को कांटे की टक्कर देने के पथ पर अग्रसर हो चली हैं। इन्हें भी चुनावी चक्कलस में बड़े मजे आ रहे हैं। लगता है चुनाव आयोग भी मतदान प्रतिशत बढ़ने के संबंध में इस जुबानी मार-काट व चीर-फाड़ का महत्व समझ रहा है। इसीलिए आपत्तिजनक बयानबाजी करने वाले नेताओं के लिए थोड़ा नरम रुख अपनाए हुए है और खुद भी आलोचना का शिकार हो रहा है। भई कुछ भी कहिए आदर्श स्थिति तो यही है कि सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों या नेताओं को अपनी जुबान पर लगाम लगानी चाहिए पर लगाम ढीली पड़ रही है और इससे देश के चुनावी महापर्व की अच्छी मार्केटिंग हो रही है तो ज्यादा चीख-चिल्लाकर गला खराब करने की क्या जरूरत है। बस देश की आम जनता से अपील है कि इस बार के नहीं बल्किी हर बार के चुनाव में, ‘वोट करते रहिए शान से।‘‘

नोट-मेरी चुनावी टिप्पड़ी को अन्यथा न लें। किसी खास राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा से प्रेरित होकर चुटकी नहीं ली है। आम महिला हंू, इसलिए अपने आम से विचारों को आम जनता के हक में लिखने का मन किया तो लिख दिया। वैसे भी आम का मौसम है। आमों के साथ आम चुनाव के रस का आनंद लीजिए। धन्यवाद!

Saturday, 3 May 2014

कहानी-डोरबेल

शहर, मोहल्ला और गली कोई भी हो औरतों की जिंदगी एक-दूसरे से कुछ खास अलग नहीं होती। कहीं यह ससुराल में दहेज न लेकर आने के लिए पीटी जाती हैं। कहीं अपनी मर्जी से छोटे-छोटे फैसले लेने के लिए तो कभी अच्छा रंग-रूप न होने के कारण भगवान की गलती का खामियाजा भी इन्हें ही पति की उलाहना और प्रताडना झेलकर चुकाना पडता है। तभी तो कई साल पहले जो बेचारी रजिया के साथ दिल्ली में घटा था, उससे मिलती-जुलती ही हालत यहां रश्मि की मालूम होती है। कलाताई पडोस से आ रही चीखों और धमाचैकडी की आवाज पर तकिए से दाहिना कान दबाए हुए सोने की कोशिश करते हुए यही सोच रही थीं। रात का एक बजा था। पडोस की रश्मि को उसका पति पीट रहा था। यह नहीं पता किस बात पर। धीरे-धीरे चीखें कम हुईं तो कलाताई को कुछ चैन पडा,लेकिन नींद नहीं आ रही थी।

कलाताई दिल्ली की रहने वाली थीं। उनका अचार-पापड का वहां फलता-फूलता बिजनेस था। पति शादी के दूसरे साल बाद ही चल बसे थे। शादीशुदा जिंदगी के कुछ कडवे अनुभवों के कारण कलाताई ने दोबारा शादी करने की सोची भी नहीं और आत्मनिर्भर बनना ज्यादा बेहतर समझा। बच्चे थे नहीं सो अपने सपने को साकार करने में उन्हें कोई खास अडचन भी नजर नहीं आई। अपने गहने बेचकर दिल्ली में ही अचार-पापड का बिजनेस  शुरू किया जो कुछ शुरूआती अडचनों के बाद चल निकला। अपने बिजनेस को लखनऊ में विस्तार देने के लिए वह आजकल अपनी बहन रज्जो के घर ठहरी हुई थीं। रज्जो ने ही बताया था कि पडोसिन रश्मि को उसका पति अक्सर मारा-पीटा करता है। जितने दिन रहेंगी उन्हें पडोस के हंगामे सुनने की आदत डालनी होगी। कलाताई ने रज्जो से कहा कि उस बेचारी रश्मि को बचाने के लिए तुम मोहल्ले वाले हस्तक्षेप क्यों नहीं करते। उसकी डोरबेल यानि दरवाजे की घंटी ही बजा दिया करो, जब वह पिट रही हो। बेचारी शायद मार खाने से बच जाए। इस बात पर रज्जो ने कलाताई को अजीब नजरों से देखा और फिर बोली जीजी आप भी न! अपना काम करने आई हो वही करो। क्या फायदा उनके घर का मामला है। उल्टे कुछ हमें ही उल्टी-सीधी सुना दी तो मुझसे तो बर्दाश्त न होगा। यह कहकर रज्जो ने बात टाल दी। लेकिन कलाताई को चैन नहीं पडा। मन ही मन उन्होंने कुछ ठान लिया था।
रज्जो के घर में ठहरे आज उन्हें चैथा दिन ही था। रश्मि की चींखें रुकरुकर करीब आधे घंटे से उनके कानों में पड रहीं थीं,लेकिन अपनी बहन रज्जो की हिदायत पर वह बडी मुश्किल से खुद पर काबू किए हुए थीं। ये चीखें उन्हें दिल्ली में उनकी काॅलोनी की एक नव विवाहिता लडकी रजिया की दर्दनाक कहानी की यादों में खींच ले गई। और कलाताई यादों के समंदर में गोते लगाने लगीं।
रजिया काॅलोनी में हकीम साहब की दूसरी बहू के नाम से जानी जाती थी। उसके पति शादाब का समाज में कोई रूतबा नहीं था। दोहाजू और  रजिया से उम्र में दोगुना था वह। शादाब की पहली पत्नी दूसरे पुरुष के प्रेम में पड जाने के बाद उसके साथ भाग गई थी। शादाब ने चार माह बाद ही दूसरे विवाह के लिए हामी भर दी थी। भला भगोडी पत्नी का शोक भी कोई पुरूष मनाता है। परलोक सिधारी हुई का भी इतने समय तक मना लें तो गनीमत समझो।
रजिया के पिता लल्लन ने उसके लिए दोहाजू लडके को इसलिए हां कर दी थी, क्योंकि रजिया की रंगत तो काली थी ही साथ ही उनकी इतनी हैसियत भी न थी कि दान-दहेज में चार बरतन भी दे सकें। रजिया के पिता गरीबी के कारण ही रजिया सहित अपनी दो अन्य बेटियों को भी स्कूल नहीं भेज सके थे। मदरसे में ही रजिया ने थोडी बहुत दीनी तालीम पाई थी। वह अपनी तीन बहनों में सबसे बडी थी। रजिया की रंगत और परिवार की गरीबी के कारण उसके रिश्ते आते ही थे, किसी न किसी खोट-नुक्स वाले। वह करीब 25 साल की थी। इसलिए बेटी की बढती उम्र की भी चिंता लल्लन को थी। लल्लन ने इसलिए जैसे-तैसे उसके हाथ पीले करके बला टाली।
ससुराल में रजिया की चीखें शादी केेेे 21वें दिन ही काॅलोनी वालों के कान फाडने लगीं थीं। सबको पता था कि शादाब जिस तरह अपनी पहली पत्नी को पीटा करता था, वैसे ही वह रजिया को भी आधी-आधी रात को मारा-पीटा करता है। लेकिन काॅलोनी के लोगों ने गाॅसिप करने के अलावा कभी हस्तक्षेप करने की हिम्मत नहीं दिखाई। यह कहकर मामला टाल दिया जाता कि यह उनका घरेलू मामला है। रजिया की शादी को पांच माह गुजर चुके थे। उसके साथ मार-कुटाई का सिलसिला जारी था।
  वह ईद का दिन था। ईद के दिन मुस्लिम समुदाय में एक दूसरे के घर जाकर गले मिलकर त्योहार की बधाई देने का चलन है। लेकिन उस दिन रजिया का घर बिल्किुल सूना पडा था। पूरा दिन गुजर गया काॅलोनी में रजिया के घर का मेन गेट खुलने की एक बार भी आवाज नहीं सुनाई दी। मुझसे रहा नहीं गया तो शाम करीब पांच बजे ईद मिलन के बहाने रजिया का हाल लेने पहंुच गई।
 मेन गेट का चैनल तो हाथ डालकर खोल लिया फिर साडी ठीक करते हुए मैने अंदर के दरवाजे की डोरबेल बजाई। लेकिन दरवाजा नहीं खुला। सोचा हो सकता है, अंदर के कमरे में टीवी देख रही हो या सो रही हो बेचारी। अकेली ही तो रहती है। उसके ससुर हकीम साहब तो खुद ही बेटे शादाब के रोज-रोज के हंगामें से तंग आकर छोटे बेटे-बहू के घर दिल्ली रहने चले गए। शादाब घर में हो न हो क्या पता। बहरहाल, इसी सोच में मैने दरवाजे की घंटी आठ या दस बार बजाई। इसके बाद बजाती चली गई, दरवाजा नहीं खुला। मैं दरवाजे पर ताला चेक करने लगी। कोई ताला नहीं लगा था। अब तक मेरे दिल की घडकने बढ चुकी थीं। किसी अनजाने खौफ से मैने रजिया, रजिया चीखना शुरू कर दिया। 10 मिनट में ही काॅलोनी के लोग इकट्ठा हो चुके थे। दरवाजा तोडा गया। घर के अंदर रजिया के बेडररूम का नजारा दिल दहला देने वाला था। रजिया की लाश दुपटटे के सहारे पंखे से झूल रही थी। बिस्तर पर लकडी का स्टूल गिरा पडा था।
  कमरे की सेंटर टेबिल पर एक कागज गिलास से दबाकर रखा मिला। उसमें उर्दू में लिखा हुआ था। मैं अपनी जिंदगी खत्म करने की जिम्मेदार हंू। जीने से ज्यादा मौत आसान लगी इसलिए यह कदम उठाया। मुझे शादी से अब तक एक बीवी होने का सुख नहीं मिला। शादाब नामर्द है। मैं तो इसपर भी उसके साथ जिंदगी बिता देती,लेकिन वह सिर्फ जिस्मानी ही नहीं बल्कि दिमागी तौर से भी बीमार है। अपनी नामर्दानगी की खीज वह मुझे हर रात पीट-पीटकर निकालता था। मेरे जिस्म को नोंच-खरोचकर वह राक्षसों की तरह ठहाके लगाता। मैं दर्द से तडपती-चीखती तो उसके चेहरे पर सुकून की लहरें हिलोरे मारतीं। मेरे जिस्म पर पडे उसके दातों और ठोकरों के निशान उसकी हैवानियत का सबूत हैं। अल्लाह गवाह है मैं यह जुल्म सहने के बाद भी जीना चाहती थी। शादाब की कैद से आजाद होना चाहती थी,लेकिन कोई बताए था मेरे लिए कोई ठिकाना जहां मुझे पनाह मिल सकती थी। ऐसे मायके में वापस जा सकती थी जहां कंुवारी बेटी ही बोझ थी। क्या मोहल्ले की उन औरतों से अपना दुख साझा करती, जिनकी निगाहें सिर्फ यह देखती थीं कि मैनें किस रंग की और कितने भारी काम वाली, कीमती साडी पहन रखी है। मैं तो मुस्तफा की पहली बीवी की तरह प्रेमी के साथ भाग भी नहीं सकती थी। खूबसूरत जो नहीं हंू फिर कौन भगाना चाहता मुझे। किसी सवाल का जवाब नहीं मिला। इसलिए जा रही हंू, हमेशा के लिए।
  मेरे पडोसी सलीम भाई ने खत जैसे ही पढकर रखा। वहां पुलिस पहंुच चुकी थी। एक-एक करके सभी काॅलोनी वालों से पूछताछ शुरू हो चुकी थी। मेरे दिमाग में आंधियां चल रही थी। पश्ताचाप की आधियां। इस घर की डोरबेल बजाने में मुझे बहुत देर हो गई। यह सोचकर मुझे खुद पर गुस्सा आ रहा था। काश की यह डोरबेल मैने पहले ही रजिया की चीखें सुनने पर बजाई होती। मुझसे देर हुई तो कोई और ही बजा देता। तब शायद यह नौबत नहीं आती। रजिया का दर्द साझा करके। शादाब की ज्यादती पर उसे रोक-टोककर काॅलोनी के किसी भी व्यक्ति ने अपने ंिजंदा होने का सबूत दिया होता तो रजिया जिंदा होती। लेकिन अब कम से कम मैं तो किसी और रजिया को यंू मरने न दंूगी। मैं करूंगी हस्तक्षेप, डोरबेल बजाकर। कलाताई को अपना यह प्रण याद आया। अपने उस प्रण को याद करते हुए वह करवटें बदल ही रही थीं कि पडोसी रश्मि की दिल दहला देने वाली चीख उनके कानों में फिर पडी। कलाताई झटके से उठीं। अपनी साडी ठीक करते हुए घर के मेनगेट की ओर बढ गईं। कुछ ही देर में कलाताई रश्मि के घर की डोरबेल बजा रही थीं। डोरबेल बजते ही अंदर का हंगामा शांत हो गया,लेकिन वह हंगामा अब शायद घर के बाहर होना तय था।
रश्मि के पति संुदर ने बडे तैश में दरवाजा खोला। पूछा क्या चाहिए। कलाताई बोलीं शांति चाहिए। झगडा और मारपीट यहां नहीं चलेगी। संुदर हतप्रभ था। बोला देखिए ये मेरे घर का मामला है। और आप तो मेरे मोहल्ले की भी नहीं हैं। हमारे मामले में न ही बोलें तो अच्छा है। कलाताई ने कहा अब यह तुम्हारे घर का मामला नहीं है। पूरे मोहल्ले की नींद उडा रखी है। उसे जानवरों की तरह पीट रहे हो। यह जुर्म है। मैं अभी पुलिस को बुलाती हंू। पत्नी पर हिंसा के अपराध में जेल की हवा खाओगे तब आएगी तुम्हारी अकल ठिकाने। इतने में रश्मि दौडकर कलाताई के गले लग गई। उसके चेहरे और बाहों पर कुछ पुराने नील और कुछ नई चोटों के निशान थे। कलाताई ने रश्मि से पूछा क्यों मार रहा था यह तुम्हें। रश्मि धीरे से बोली ’दाल में नमक’ ज्यादा हो गया था। कलाताई ने संुदर की तरफ देखा तो अब तक उसकी तनी हुई गरदन थोडी झुक चुकी थी। अब तक कलाताई की बहन रज्जो, बहनोई सुशील और मोहल्ले के अन्य लोग भी रश्मि के घर के दरवाजे पर इकट्ठे हो चुके थे। कलाताई ने बडे विश्वास के साथ कहा चल रश्मि मैं तेरे जख्मों पर दवा लगा देती हंू। मैं अभी दिल्ली वापस नहीं जा रही। तेरा पति अगर फिर ऐसी हरकत करेगा तो मैं फिर तेरे घर की डोरबेल बजाऊंगी। मैं न भी रही तो तेरे मोहल्ले वाले तेरा साथ देंगे। यह कहते हुए कलाताई ने मोहल्ले के गणमान्य व्यक्तियों की तरपफ देखा तो जैसे आंखों ही आंखों में सबने कलाताई को रश्मि के लिए वादा दे दिया।

नोटः जागरुकता के अभाव में आज भी हजारों महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार हो रही हैं। इससे महिलाओं का शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होता है। हालांकि देश में ‘घरेलू हिंसा से संरक्षरण कानून-2005‘ लागू है फिर भी घरेलू हिंसा से प्रताडि़त कई महिलाएं आत्महत्या तक कर लेती हैं। कहानी के माध्यम से समस्या बताने और इसका समाधान सुझाने के पीछे ब्लाॅगर यानी कि मेरा एकमात्र उद्देश्य है भारतीय समाज में जागरुकता लाना। मेरी किसी भी कहानी व लेख को अन्यथा न लिया जाए। मेरी यह कहानी हिन्दी मासिक पत्रिका ‘दस्तक टाइम्स‘ में प्रकाशित हो चुकी है। धन्यवाद!